उत्तराखण्ड में बढ़ती बेरोजगारों की फौज

देहरादून, सवा करोड़ आबादी वाले प्रदेश में 10 लाख से ऊपर बेरोजगार घूम रहे हों और इस भीड़ में हर साल 50 हजार से अधिक की बढ़ोत्तरी हो रही हो, तो क्या हालात सामान्य ठहराए जा सकते हैं? शायद नहीं. सरकार को यह अंदेशा है या नहीं, कहा नहीं जा सकता, लेकिन सच यह है कि बेरोजगारी उत्तराखंड में ‘विस्फोटक’ स्थिति में पहुंच चुकी है. सिर्फ सरकारी आंकड़ों की ही बात करें, तो राज्य के सेवायोजन कार्यालयों में हर साल 50 से 60 हजार के बीच नए बरोजगार पंजीकृत हो रहे हैं. यह हाल तब है, जबकि सेवायोजन कार्यालयों पर से काफी बेरोजगारों का भरोसा उठ चुका है. राज्य बनते वक्त पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या पूरे तीन लाख भी नहीं थी, जबकि आज यह आंकड़ा 10 लाख पार कर चुका है. सेवायोजन के हाल यह हैं कि सोलह साल में पूरे 50 हजार लोगों को भी रोजगार नहीं मिला है. रोजगार के आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार साल भर से औसतन दो हजार युवाओं से अधिक को रोजगार नहीं दे पा रही है.

सच्चाई यह भी है कि बेरोजगारी के मुद्दे पर ईमानदार कोशिश हुई ही नहीं. हुक्मरान तो सिर्फ ‘सत्ता’ के खेल में उलझे रहे. जिन पर राज्य के भविष्य की जिम्मेदारी रही वे सिर्फ अपनी तरक्की के फेर में उलझे रहे. प्रदेश में आज हाल यह है कि अधिकारियों के पद कम पड़ रहे हैं, और कर्मचारियों यानि समूह ‘ग’ व ‘घ’ की कोई सुध लेने वाला नहीं. इसके तमाम उदाहरण हैं कि राज्य बनते चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी आज अधिकारी की श्रेणी में आ चुके हैं, लेकिन बेरोजगारों को लेकर कोई संजीदगी नहीं. सरकार कोई भी रही हो हर सरकार में बेरोजगारों के नाम पर सिर्फ छल हुआ. नतीजा सरकारें आज तक राज्य में रोजगार नीति नहीं बना पाई. चुनाव के वक्त हर दल ने वायदे किए, लेकिन जब वायदों को पूरा करने की बारी आई, तो किनारा कर गए. प्रदेश के सौ से अधिक सरकारी महकमों में लगभग 40 हजार के करीब पद खाली हैं, सरकार इन पदों को चरणबद्ध तरीके से भरने की कोई व्यवस्था नहीं बना पाई. अक्सर सरकार आयोग से हुई नियुक्तियों को उपलब्धि बताती है, लेकिन सरकार यह भूल रही है कि बेरोजगारों की जो भारी भरकम फौज खड़ी है, उसमें 60 फीसदी बेरोजगार ऐसे हैं, जो स्नातक भी नही हैं.

10 लाख पंजीकृत बेरोजगारों में 4 लाख के लगभग ऐसे युवा हैं, जिनकी शैक्षणिक योग्यता महज इंटर है. 2 लाख के लगभग बेरोजगार सिर्फ हाईस्कूल पास है. तकरीबन 50 हजार युवा ऐसे हैं, जो हाईस्कूल भी नहीं हैं. साफ है कि राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, जिन्हें छोटी-छोटी नौकरियों की तलाश है. पूर्व में सरकार ने बेरोजगारों को प्रदेश में बेरोजगारी भत्ता देने की बात भी कही, लेकिन राज्य में 30 हजार बेरोजगारों को भी भत्ता नहीं दे पाई. मौजूदा सरकार तो इसे भी बंद करने जा रही है. यही नहीं सरकार ने ऐलान किया है कि तीन साल से लंबे समय से जो पद खाली चल रहे हैं, उन्हें समाप्त कर दिया जाएगा. ऐसे में तकरीबन 25 हजार खाली पद भी खत्म हो जाएंगे, ताकि अब बेरोजगार यह भी सवाल न उठा पाएं कि पद खाली हैं और फिर भी नियुक्ति क्यों नहीं हो पा रही है. हालात बेहद चिंताजनक हैं. सच यह है कि पहले आपदा, फिर नोटबंदी और अब जीएसटी लागू होने के बाद बेरोजगारी का आंकड़ा और तेजी से बढ़ रहा है. राज्य में बढ़ती बेरोजगारी किसी ‘बारूद’ के कम नहीं, यह सरकार लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति है. यदि एहतियात न बरती गई तो इसके दूरगामी परिणाम राज्य के भविष्य के लिए घातक भी हो सकते हैं.