जानें क्यों मनाई जाती है नागपंचमी, क्या है महत्व

नागपंचमी का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है हिन्दू लोग इस पर्व को हर्षोउल्लास से मनाते है. वहीं हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान शिवजी सर्पों की माला पहनते है, विष्णु भगवान शेषनाग पर शयन करते हैं इसीलिए इनकी पूजा के लिए प्रति वर्ष श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी पर्व मनाया जाता है.

पुराणों के अनुसार महाभारत की कथाओं से पता चलता है कि नाग भारत की एक जाति थी जिसका आर्यों से संघर्ष हुआ करता था. आस्तीक ऋषि ने आर्यों और नागों के बीच सद्भाव उत्पन्न करने का बहुत प्रयत्न किया. वे अपने कार्य में सफल भी हुए. दोनों एक-दूसरे के प्रेम सूत्र में बंध गए. यहां तक कि वैवाहिक संबंध भी होने लगे. इस प्रकार अंतर्जातीय संघर्ष समाप्त हो गया. सर्पभय से मुक्ति के लिए आस्तीक का नाम अब भी लिया जाता है. सर्प मंत्रों से विशेष, आस्तीक के नाम का प्राय: प्रयोग करते हैं. इससे यह भी संकेत मिलता है कि नाग जाति और सर्प वाचक नाग में भी पारस्परिक संबंध है. यह भी प्रसिद्ध है कि पाणिनी व्याकरण के महाभाष्यकार पतंजलि शेषनाग के अवतार थे. वाराणसी में एक नागकूप है जहां अब भी नाग पंचमी के दिन वैयाकरण विद्वानों में शास्त्रार्थ की परम्परा है.

वर्षा ऋतु में नाग पंचमी मनाने के पीछे भी ठोस कारण हैं. दरअसल, बरसात में बिलों में पानी भर जाने से सांप बाहर आ जाते हैं. वे आश्रय की खोज में रिहायशी इलाकों, सड़कों, खेतों, बाग-बगीचों और झुरमुटों में आकर छिप जाते हैं. ऐसे में हम सब उन्हें देख कर भयभीत होते हैं. हालांकि सच यह है कि मनुष्य जितना सांपों से डरता है, उतना ही वे भी मनुष्य से डरते है. बिना कष्ट पाए या छेडख़ानी के वे आक्रमण नहीं करते. ऐसे में वे हमें कोई नुकसान न पहुंचाएं, इसके लिए उनकी पूजा करके प्रसन्न करने की प्रथा स्वाभाविक है.

नाग पूजा हमारे देश में प्राचीन काल से प्रचलित है. वराह पुराण में इस उत्सव के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि आज के ही दिन सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने प्रसाद से शेषनाग को विभूषित किया था. इनके द्वारा पृथ्वी धारण रूप में अमूल्य सेवा करने के अतिरिक्त नाग जाति के और भी महत्वपूर्ण कार्य हैं. समुद्र मंथन के समय वासुकि नाग की रस्सी बनाई गई थी. यही कारण है कि आदि ग्रंथ वेदों में भी नागों को नमस्कार किया गया है.