मोदी की डॉलर डिप्‍लोमेसी से घबराया ड्रैगन

चीन के आक्रामक रुख का भारत की ओर से मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है. इसके साथ-साथ मोदी सरकार की डॉलर डिप्लोमेसी से भी चीन काफी परेशान है. चीन के पास इसका कोई तोड़ नहीं मिल रहा है. देरी से ही सही लेकिन भारत ने दुनियाभर में बुनियादी ढांचा मजबूत करने और आर्थिक उपक्रमों के लिए कर्ज देने के मामले में चीन का तेजी से पीछा कर रहा है. चीन को पीछे छोड़ने के लिए मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही साझेदार देशों के लिए (लाइन ऑफ क्रेडिट) कर्ज की राशि बढ़ाकर 24.2 अरब डॉलर तक कर दी है. ये आंकड़ा साल 2003 से 2014 के बीच महज 10 अरब डॉलर ही था. मई 2014 से अब तक करीब 14.2 अरब डॉलर के 52 अलग-अलग कर्ज दिए गए हैं. इसके और बढ़ने की संभावना है क्योंकि इस साल जॉर्डन के बादशाह और बेलारूस के राष्ट्रपति भारत दौरे पर आने वाले हैं. उनके इन दौरों के बाद कुछ और कर्जों का ऐलान हो सकता है.

 

अफ्रीका को लेकर भारत की नीतियों में जरूरी सुधार करते हुए मोदी सरकार ने पिछले दो साल में करीब 20 बड़े उपक्रमों को पूरा किया है. विदेश मंत्रालय के डेवलपमेंट पार्टनरशिप एडमिनिस्ट्रेशन विंग ने अब कर्ज नीति में अहम बदलाव करते हुए खास फोकस क्षमता विस्तार पर नहीं बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर किया है. चीन ने सभी महाद्वीप में द्विपक्षीय भागीदारी को लेकर खास हॉलमार्क खड़े कर रखे हैं.

 

एशिया और अफ्रीका में चीन के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर खास नजर रखने वाले एक जानकार ने बताया कि ऐसी परियोजनाओं के राजनीतिक महत्व होते हैं जो दो देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाते हैं. इसमें भी चौंकाने वाली बात ये है कि चीन इन परियोजनाओं के मनमाफिक शर्ते लगाता है जबकि भारत इस संवेदनशील रवैया रखता है. एक जानकार के मुताबिक, आने वाले कुछ साल में भारत की ओर से दिए जाने वाले लाइन ऑफ क्रेडिट (एलओसी) बढ़ने के आसार हैं. पिछले एक साल में 10 देशों के बीच 925.94 मिलियन डॉलर के करीब 13 प्रोजेक्ट्स पूरे किए गए हैं. इससे ये साफ हो जाता है कि विकास की भागीदारी में भारत की विदेश नीति का अहम हिस्सा है.