1944 में गांधी को बचाने वाले स्वतंत्रता सेनानी भिलारे का निधन

98 साल की उम्र में महाराष्ट्र के भिलार में स्वतंत्रता सेनानी भीकूदाजी भिलारे का देहांत हो गया. भिलारे गुरुजी के नाम से जाने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी को 1944 में पंचगनी में नाथूराम गोडसे से महात्मा गांधी को बचाने का श्रेय दिया जाता है. कई लेखकों को दिए अपने इंटरव्यू में भिलारे ने कहा था,’पंचगनी में महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में कोई भी शामिल हो सकता था. उस दिन उनके सहयोगी ऊषा मेहता, प्यारेलाल, अरुणा असफ अली और अन्य प्रार्थना में मौजूद थे. गोडसे दौड़ते हुए आया, उसके हाथ में चाकू था. वह कह रह था कि उसके पास कुछ सवाल हैं. मैंने उसे रोका, उसका हाथ मरोड़ा और चाकू छीन लिया. गांधी जी ने उसे जाने दिया.’

 

महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी के दस्तावेज भी इस ओर इशारा करते हैं. हालांकि कपूर कमिशन के अनुसार जुलाई 1944 की जिस घटना का जिक्र भिलारे ने किया, वह कितनी सही है यहां तक कि ऐसी कोई घटना हुई भी थी कि नहीं, के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है. जब भिलारे के सहयोगी मणिशंकर पुरोहित को कमिशन के सामने पेश किया गया तो उन्होंने बताया कि यह घटना 1944 में नहीं जुलाई 1947 में हुई थी. इस घटना में भिलारे का कोई खास जिक्र भी नहीं था. कमिशन को बस इतना पता चला कि 1944 में उस दिन प्रार्थना सभा में कुछ लोगों के कारण अशांति का माहौल हो गया था.

 

महात्मा गांधी की हत्या की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज जेके कपूर ने 22 मार्च 1965 को एक कमिशन बनाया. कमिशन को यह पता चला कि 1944 में गांधी को मलेरिया हो गया था और उनके डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी थी. इसके बाद गांधी पंचगनी चले गए.