आपका सबसे बुरा समय ही आपको निखार कर बेहतर बनाता है : सीमा बख्शी

सीमा बख्शी, हल्द्वानी

‘मेरी पेंटिंग आम दुनिया की पेंटिंग्स हैं जिनमें आप उन सभी बातों को ढूंढ सकते हैं जो एक इंसान को कचोटती हैं.’ यह कहना है सीमा बख्शी का जो हाल ही में यूनेस्को द्वारा प्रायोजित एक अंतरराष्ट्रीय कला मंच का हिस्सा बनकर लौटी हैं. जहां उन्होंने दुनियाभर से आए बेहतरीन कलाकारों के साथ अपने कैनवस में रंग बिखेरे और खासी तारीफ भी बटोरी. भारत की ओर से वह एकमात्र कलाकार थीं. www.uttaranchaltoday.com का रू-ब-रू अंक ख़ास ऐसे कलाकारों से आपको मिलवाता है जो अपनी कला से समाज को प्रभावित कर रहे हैं. इसी कड़ी में हमसे बातचीत में सीमा बख्शी ने अपनी कला से जुड़े कई अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली. इसी बातचीत के कुछ अंश आपके लिए प्रस्तुत हैं–

सीमा बताती हैं कि कोई भी व्यक्ति अगर अपनी आत्मा की गहराई को समझकर दुनिया को टटोले तो बेशक वो एक बॉर्न आर्टिस्ट न भी हो, पर वह एक कलाकार बन सकता है फिर चाहे वह उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो.

उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर में रहने वाली और हमेशा से पढ़ाई की ओर झुकाव रखने वाली सीमा ने विज्ञान विषय से अपनी परास्नातक डिग्री हासिल की. फिलहाल एंटीबायोटेक दवाओं पर अपोलो अस्पताल जैसे संस्थानों से जुड़कर अपनी रिसर्च पूरी कर रही हैं. अध्यापन में रुचि होने के करण उन्होंने कुछ समय हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज में बायोटेक विषय को पढ़ाया भी.

सीमा बख्शी

सीमा आगे बताती हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने अपने भाइयों को हमेशा के लिए खो दिया और डिप्रेसन का शिकार हो गईं. नौबत यहां तक आ गई कि उन्हें हमेशा दवाइयों के सहारे जीने को कहा गया और वह उनकी जीवनशैली का एक हिस्सा बन गया. लेकिन सीमा एक रोचक बात बताती हैं, ‘एक रोज जब मैं अपने रुटीन चेकअप के लिए दिल्ली में अपने एक मित्र डॉक्टर के पास पहुचीं तो उन्होंने अचानक मुझसे पूछ लिया कि तुमको क्या करना पसंद हैं और मैंने भी अचानक बोल दिया पेंटिंग. जबकि पेंटिंग से मेरा कोई ख़ास नाता नहीं था.’ यह सुनते ही डॉक्टर बोले कि आज से पेंटिंग में जिन्दगी ढूंढना शुरू करो, दवाइयां सारी बंद. वही दिन था, जब एक नए सफ़र की शुरुआत हुई और सीमा ने खुद को ही अपना गुरु मानकर काम शुरू कर दिया.

सीमा की कहानी और भी रोचक तब बन जाती है जब वह अपनी पेंटिंग कला को कैसे विकसित किया इसके बारे में बताती है. इसमें सबसे ज्यादा सहायक हुआ सोशल मीडिया, जहां उन्होंने कई ऐसे बड़े देश-विदेश के कलाकारों से सम्पर्क साधा और उनसे प्राप्त जानकारी से अपनी कला को विकसित किया. कभी-कभी तो कई कलाकार रात में ऑनलाइन आते थे और विडियो लेक्चर देते थे. ऐसे में वह रातभर जागकर उनसे पेंटिंग की बारीकियों को सीखती रहती थीं. इस तरह बिना किताबी शिक्षा लिए सीमा ने अपने हुनर को संवारा. अब बारी थी कैनवस पर उनको उतारने की. सीमा ने अपनी नकारात्मक ऊर्जा को अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से बाहर निकाला और कैनवस में दर्शाना शुरू कर दिया. दोस्तों और परिवार से सराहना मिलने के बाद सीमा का हौसला और बढ़ गया, जिसने उनके इस शौक को एक नई दिशा दी और उन्होंने हल्द्वानी में ही अपनी पेंटिंग्स की पहली प्रदर्शनी लगाई. दो दिन चली इस प्रदर्शनी ने लोगों को आकर्षित किया और सीमा की कला को एक बड़ी पहचान मिलने में मदद की.

यूनेस्को द्वारा प्रायोजित कार्यशाला में भाग लेती सीमा बख्शी

जल्द ही वह अपनी दूसरी प्रदर्शनी लेकर आने वाली हैं. जीवन को मोड़ देने के लिए शुरू किया गया ये काम अब सीमा की जिंदगी का अटूट हिस्सा है. इसीलिए वह बताती हैं, ‘मैं अपनी पेंटिंग्स से अपने जीवन की सभी घटनाओं को जोड़ पाती हूं, जो मुझे बेहद रोमांचित करता है.’ इसी कड़ी में वह आगे बताती हैं, ‘यूनेस्को द्वारा प्रायोजित 6 दिवसीय वर्कशॉप का अनुभव एकदम अलग और बेहतरीन था. वहां कई देशों के कलाकार आए थे और वह सभी चीज़ों में भिन्न थे. यहां तक की कई तो अंग्रेजी बोलना भी नहीं जानते थे. एसे में सिर्फ आपकी कला ही आपको जोड़कर रखती है और बिना बोले ही आप समझने लगते हैं, फिर सिलसिला शुरू होता है सीखने का. यह एक बेहतरीन अनुभव था.’

हल्द्वानी ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में सीमा बख्शी अब एक चर्चित नाम है. उत्तरांचल टुडे के पूछने पर कि वह नई पीढ़ी को क्या सन्देश देना चाहती हैं तो वह कहती हैं – Follow your soul, be clear by heart, be original. Keep your eyes open and observe the world in your way and you’ll get success. (अपनी आत्मा की आवाज़ सुने, हृदय से निर्मल रहें, वास्तविकता में रहें, आंखों को खोलें और संसार को अपनी तरह से देखें, तो आप जो भी करना चाहते हैं उसमें कामयाबी जरूर मिलेगी). अभिवावकों के लिए भी सीमा कहना चाहती हैं कि अपनी असफलताओं या जिज्ञासाओं को बच्चों को बिना जाने उन पर न लादें. उनको वही करने दें जो वो खुद अपने लिए चुनना चाहते हैं क्योंकि कोई भी कला चाहे फिर वो पेंटिंग ही क्यों न हो, सिर्फ अपने प्रयासों से निखरती है किसी भी दबाव से नहीं.