हरेला की शुभकामनाएं | जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये

‘जी रये, जागि रये,
धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये।
सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो, दूब जस फलिये
सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।

देवभूमि उत्तराखंड के लोग पर्यावरण और हरियाली के प्रति कितने संजीदा हैं, इस बात का द्योतक है हरेला पर्व। हरेला उत्तराखंड और खासकर कुमाऊं मंडल का प्रमुख पर्व है। रविवार 15 जुलाई को पूरी श्रद्धा भाव से हरेला का पर्व मनाया जा रहा है। आज से 9 दिन पहले हरेला बोया गया था, जिसे रविवार सुबह पंडित जी की मौजूदगी में काटा गया। पिछले 8-10 दिनों से हरेला के अच्छे उत्पादन के लिए इसमें सुबह-शाम पानी दिया गया। क्योंकि मान्यता है कि हरेला जितना बड़ा और सघन होगा, फसल भी उतनी ही अच्छी होगी।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी हरेला पर्व की बधायी दी है। उन्होंने इस संबंध में एक ट्वीट किया है।

हरेला को मंगलकारी माना जाता है. हरेला का मतलब हरियाली से है और यह पर्व देशभर में चैत्र, श्रावण और अश्र्विन महीनों में मनाया जाता है। मूल रूप से यह पर्व नई ऋतु के आगमन का सूचक है। लेकिन, उत्तराखंड में श्रावण माह में हरेला हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

9 दिन पहले लोगों ने थालीनुमा पात्र या टोकरी में मिट्टी डालकर उसमें गेहूं, जौ, धान, गहत, सरसों आदि के सात या पांच प्रचार के बीज बोए थे। रविवार सुबह महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजकर हरेले को काट रही हैं और इसके बाद परंपरानुसार पूजा-अर्चना की जा रही है।

इसके बाद घर की बुजुर्ग महिलाएं सभी सदस्यों को हरेला लगा रही हैं। हरेला लगाने की शुरुआत पैरों से होती है और सबसे अंत में सिर पर लगाया जाता है। हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि फसलों को कोई नुकसान न हो। हरेला का अर्थ हरियाली से है।

हरेला पर्व पर भगवान शिव की मूर्ति गढ़ना भी मंगलकारी होता है. आप सभी पाठकों को उत्तरांचलटुडे की ओर से हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं…