उत्तराखंड की इस लड़की ने किया कमाल, घर में उगा डाली सेक्स पावर बढ़ाने वाली दवा

पहाड़ की इस लड़की ने वह सब कर द‌िखाया जो अभी तक पूरे भारत में कोई नहीं कर पाया. प्राकृतिक रूप से पाई जानी वाली कीड़ाजड़ी (दवा और सेक्स पावर बढ़ाने वाली) को इसने घर में ही उगा डाला.

उत्तराखंड सरकार की मशरूम ब्रांड एंबेसडर और राष्ट्रपति के हाथों नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित हो चुकी दिव्या रावत के खाते में एक और उपलब्धि दर्ज हो चुकी है. उन्होंने अपनी लैब में मशरूम की एक विशेष प्रजाति कॉर्डिसेप्स मिलिटरीज (कीड़ाजड़ी) उगाने में कामयाबी पाई है. उनका दावा है कि ऐसा करने वाली वह भारत की पहली महिला ग्रोवर हैं.

बता दें कि कॉर्डिसेप्स मिलिटरीज प्राकृतिक रूप से उगने वाली कीड़ाजड़ी (कॉर्डिसेप्स साइनेसिस) का ही एक रूप है, जिसे विदेशों में इसके विकल्प के रूप में लैब में तैयार किया जाता है. अस्थायी राजधानी देहरादून के मोथरोवाला गांव में अपने छोटे से घर में 100 बैग के साथ मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में कदम रखने के बाद दिव्या कामयाबी के रोज नए शिखर छू रही हैं. दिव्या का एक छोटा सा प्रयास आज सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में लोगों के सामने है.

जिसके माध्यम से दिव्या अपने साथ तमाम उन लोगों की जिंदगी को मुकाम देने की कोशिश में लगी हैं, जो लोग खुद के बूते आगे बढ़ना चाहते हैं. बटन, मिल्की मशरूम और ओएस्टर की कई प्रजातियों के सफल उत्पादन के बाद दिव्या ने कीड़ाजड़ी लैब में उगाने के बारे में सोचा.

इसी के तहत दिव्या ने इसी साल अप्रैल माह में थाईलैंड का दौरा किया और वहां इसकी तकनीक सीखी. बता दें कि थाइलैंड, वियतनाम और चीन में इस स्पीशीज का लैब में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है.

प्राकृतिक रूप से पाई जानी वाली कीड़ाजड़ी की अनुपलब्धता के कारण इसका महत्व और कारोबार दूसरे देशों लगातार बढ़ रहा है. बकौल दिव्‍या, थाईलैंड से टिश्यू कल्चर लाने के बाद मैंने खुद लैब में इसका लिक्विड स्पॉन तैयार किया.

कामयाबी की उम्मीद कम थी, लेकिन मैंने कर दिखाया. इस काम में थाईलैंड की मशरूम ग्रोवर नानिंग पुंगटोन और कैंथो एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, वियतनाम की डॉ. ज्यून ने ट्रेनिंग लेने से लेकर अब तक लगातार उनका मार्गदर्शन किया.

इस फंगस में प्रोटीन, पेपटाइड्स, अमीनो एसिड, विटामिन बी-1, बी-2 और बी-12 जैसे पोषक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं. ये तत्काल रूप में ताकत देते हैं. इसलिए एथलीट खिलाड़ियों द्वारा विशेष तौर पर इसका सेवन किया जाता है. ये एक तरह का प्राकृतिक स्टीरॉयड है, जो डोपिंग टेस्ट में भी पकड़ में नहीं आता है.

चीन और तिब्बत में परंपरागत चिकित्सा पद्धति में इसका उपयोग किया जाता है. फेफड़ों और किडनी के इलाज में इसे जीवन रक्षक दवा माना गया है. यौन उत्तेजना बढ़ाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. सांस और गुर्दे की बीमारी में भी इसका उपयोग किया जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है.

प्राकृतिक तौर पर पैदा होने वाली कीड़ाजड़ी छह माह में तैयार होती है. जबकि लैब में ढाई महीने का समय लगता है. प्रतिबंधित श्रेणी में होने के कारण कीड़ाजड़ी तस्कर इसे पाने के लिए सक्रिय रहते हैं. इसके अंधाधुंध दोहन से हिमालय की नाजुक जैव विविधता और पारिस्थितिकी का नुकसान पहुंचता है. जबकि लैब में इसे तैयार करने के लिए ठीक उसी तरह का वातावरण तैयार किया जाता है.

उत्तराखंड में चमोली और पिथौरागढ़ जिले के धारचूला में कीड़ाजड़ी प्राकृतिक रूप से 3500 मीटर ऊंचाई वाले स्थानों पर पाई जाती है. सामान्य तौर पर समझें तो ये एक तरह का जंगली मशरूम है, जो एक खास कीड़े की इल्लियों यानी कैटरपिलर्स को मारकर उस पर पनपता है. स्थानीय लोग इसे कीड़ा-जड़ी कहते हैं, क्योंकि ये आधा कीड़ा है और आधा जड़ी है. चीन-तिब्बत में इसे यारशागांबू कहा जाता है. मई से जुलाई तक जब बर्फ पिघलती है तो इसके पनपने का चक्र शुरू जाता है. कीड़ाजड़ी भूरे रंग की होती है, और इसकी लंबाई लगभग 2 इंच होती है. जबकि लैब में उगने वाली कीड़ाजड़ी का रंग गुलाबी होता है और इसकी लंबाई करीब पांच से सात सेंटीमीटर होती है.