7,000 करोड़ खर्चने के बाद भी गंगा की हालत में सुधार नहीं : एनजीटी

गंगा नदी की दयनीय स्थति

गरुवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कहा कि सरकार ने गंगा नदी की साफ-सफाई पर पिछले दो साल में 7,000 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, लेकिन यह अब भी गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा बना हुआ है. अधिकरण ने गुरुवार को गंगा की सफाई के लिए कई निर्देश जारी किए, जिसमें नदी के किनारे के 100 मीटर के दायरे में सभी निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाना भी शामिल है.

अपने विस्तृत फैसले में अधिकरण ने नदी के 500 मीटर के दायरे में आने वाले इलाकों में कचरा फेंकने पर भी रोक लगा दी . फैसले में यह भी कहा गया कि इस आदेश का उल्लंघन करने वालों पर 50,000 रूपए का जुर्माना लगाया जाएगा.एनजीटी ने कहा कि केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य के स्थानीय निकायों ने मार्च 2017 तक 7304.64 करोड़ रुपए खर्च कर किए, लेकिन नदी की हालत में सुधार नहीं हुआ है और वह एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा बनी हुई है.

अधिकरण ने कहा कि उत्तराखंड के हरिद्वार से लेकर उत्तर प्रदेश के उन्नाव के बीच नदी के किनारों से 100 मीटर के दायरे में आने वाले इलाके नो डेवलपमेंट जोन होंगे यानी इन जगहों पर कोई निर्माण कार्य नहीं होगा. एनजीटी ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे दो साल के भीतर सीवेज शोधन संयंत्र लगवाने और नालों की सफाई करने सहित विभिन्न परियोजनाएं पूरी करें. पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को छह हफ्ते के भीतर चमड़े के कारखानों को कानपुर के जाजमउ से हटाकर उन्नाव के चर्म स्थलों या किसी अन्य उचित जगह पर स्थापित करना होगा. एनजीटी ने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड सरकारों को गंगा एवं इसकी सहायक नदियों के घाटों पर धार्मिक गतिविधियों के लिए दिशानिर्देश तैयार करने का भी निर्देश दिया.

आदेश का स्वागत करते हुए जानेमाने पर्यावरणविद और वकील एम सी मेहता, जिनकी याचिका पर यह फैसला आया है, ने केंद्र और राज्य सरकार की ओर से गंगा के 500 किलोमीटर लंबे क्षेत्र की सफाई पर 7,000 करोड़ रुपए सेज्यादा खर्च करने के मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की.एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि फैसले में जिन परियोजनाओं का जिक्र किया गया है उन्हें अंतिम रूप नेशनल क्लीन गंगा मिशन द्वारा किया जाएगा . आदेश में कहा गया कि प्राथमिक तौर पर यह जल संसाधन मंत्रालय और नेशनल क्लीन गंगा मिशन की जिम्मेदारी होगी कि वे उपलब्ध धनराशि से इन परियोजनाओं को अंतिम रूप दें .

अधिकरण ने जल संसाधन मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति का भी गठन किया जिसमें आईआईटी के प्रोफेसरों और उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों को शामिल किया जाएगा . अपने 543 पन्नों के आदेश में एनजीटी ने कहा कि यह समिति निर्देशों के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी . एनजीटी ने समिति से कहा कि वह नियमित अंतराल पर रिपोर्ट सौंपे.अधिकरण ने कहा कि जरा भी दूषित द्रव्य निकलने और कचरे की ऑनलाइन निगरानी की अवधारणा औद्योगिक इकाइयों पर लागू नहीं होगी . एनजीटी ने कहा कि गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में आने वाली इकाइयों को अंधाधुंध तरीके से भूजल के इस्तेमाल से रोका जाना चाहिए.

अधिकरण ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और अन्य हितधारकों की दलीलें 18 महीने तक सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था . गंगा में प्रदूषण पर उच्चतम न्यायालय में सामाजिक कार्यकर्ता एम सी मेहता की ओर से जनहित याचिका दाखिल किए जाने के करीब 32 साल बाद एनजीटी ने हरिद्वार से उन्नाव के बीच सफाई परियोजना के दूसरे चरण पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था. न्यायालय ने मेहता की याचिका 2014 में एनजीटी के पास भेज दी थी.एनजीटी ने उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल से होकर गुजरने वाली गंगा की सफाई के अभियान को नदी के चार चरणों में बांट दिया था. यह नदी करीब 2500 किलोमीटर की दूरी तय करती है. एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ गोमुख से हरिद्वार के बीच पहले चरण के बाबत दिसंबर 2015 में ही अपना फैसला सुना चुकी है और अब दूसरे चरण के फैसले में हरिद्वार से लेकर उन्नाव के बीच गंगा पुनर्जीवन के उपायों पर फैसला आया है .