माणा की बुनकरी और बद्रीनाथ का प्रथम प्रसाद | अलग दुनिया का एहसास है ये…

व्योमेश चन्द्र जुगरान। दिल्ली से यदि आप गाजियाबाद की ओर चलें तो सड़क के किनारे किलोमीटर दर्शाने वाले पत्थर पर आपको ‘माना’ लिखा नजर आएगा, जो करीब 500 किलोमीटर की दूरी दिखा रहा होगा. माना यानी माणा, बद्रीनाथ से करीब साढ़े तीन किलोमीटर आगे तिब्बत सीमा पर देश का अंतिम गांव. बदरी विशाल की खूबसूरत उपत्यका में बसे इस तक गांव आज से कुछेक साल पहले तक पैदल ही जाया जा सकता था. तब गांव के निकट सरस्वती नदी पर बने पुल से ठीक पहले भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का शिविर हुआ करता था.

यहां जांच-पड़ताल से गुजरकर ही आप माणा में प्रवेश कर सकते थे. कैमरा इत्यादि ले जाने की मनाही थी. मगर अब माणा तक खूब चौड़ी सड़क है, जिसे राष्ट्रीय राजमार्ग का दर्जा हासिल है. इस पर कोई भी धड़ल्ले से आ-जा सकता है. यह सड़क ऊपरी हिमालय में माणा दर्रे की ओर घस्तौली तक चली गई है. यहीं भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का अंतिम कैंप है.

माणा गांव से कुछ फर्लांग ऊपर परतदार से दिखने वाले शिलाखंड की गोद में व्यास गुफा नाम का स्थान है. पहले यहां तक आने के लिए स्पष्ट रास्ता नहीं था, पर अब बाकायदा कंक्रीट की पगडंडी बन चुकी है. गुफा का स्वरूप भी बदलते समय के साथ व्यावसायिक हो चुका है. जो भी सैलानी माणा आता है, वह व्यास गुफा की थाह जरूर लेता है. स्थानीय लोगों ने असमर्थ श्रद्धालुओं को गुफा तक ले जाने के लिए कंडियों का इंतजाम कर आय का साधन भी खड़ा कर लिया है. मान्यता है कि महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना इसी गुफा में बैठकर की थी.

गुफा के अंदर व्यास की प्रतिमा भी स्थापित है. गुफा के ठीक पास एक चाय की दुकान है जिस पर लिखा है- भारत की आखिरी चाय की दुकान. लेकिन दुकान पर जिस प्रकार चाउमिन से लेकर चिप्स तक, हर तरह का जंक फूड मौजूद होता है, उसे देखकर तो कहा जा सकता है कि यह अंतिम नहीं, देश की प्रथम दुकान है जो इस उपत्यत्का में आधुनिक जीवनशैली की अलकनंदा बहाने में जरा भी पीछे नहीं है.

माणा गांव के जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान है. यहां की एक अधेड़ महिला से सामना हुआ. मुझे अपनी बोली यानी गढ़वाली में बतियाते देख वह तुरंत आत्मीय हो उठी. उसने घर की चारदिवारी पर सजाकर छोटे-छोटे दन यानी आसननुमा कालीन रखे हुए थे जिन्हें उसके परिवार ने खुद ही खड्डियों पर बुनकर तैयार किया था. व्यास गुफा तक आने वाले तीर्थ यात्रियों में से कोई इन आसनों का ग्राहक बन सके, इसी आस में महिला का पूरा दिन बीतता है. लेकिन बिक्री का संयोग कभी-कभी ही बन पाता है.

दरअसल माणा गांव में कभी घर-घर हथकरघे हुआ करते थे. कालीन व भेड़ के ऊन से तैयार अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का यहां अच्छा-खासा कारोबार था. इन उत्पादों को ये लोग सर्दियों में निचली घाटियों की ओर अपने अस्थाई ठिकानों में साथ ले जाते. वहां बाजार तक पहुंच बनाना आसान था. पर अब नई पीढ़ी गांव में वापसी नहीं चाहती. पलायन, जनजातीय आरक्षण और रोजगार के वैकल्पिक साधनों के बीच उसे अब निचली घाटियों के अस्थाई ठिकाने ही स्थायी लगने लगे हैं.

माणा गांव की बुनकरी को भगवान बद्रीनाथ के महात्म्य से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. परंपरा के मुताबिक बद्रीनाथ के कपाट बंद होते समय गांव की किसी कन्या को भेड़ से ऊन उतारकर उसे धोना, कातना और फिर बुनना होता है. एक ही दिन में तैयार इस ऊनी वस्त्र/कंबल को घृत में सानकर भगवान की प्रतिमा से लपेट दिया जाता है और फिर प्रतिमा को सुलाकर सर्दियों भर के लिए कपाट बंद कर दिए जाते हैं. पुन: छह माह बाद जब कपाट खुलते हैं तो इसी कंबल का एक-एक धागा/कतरन अखंड ज्योति के दर्शन करने आए श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया जाता है.

माणा गांव के उद्यमशील नारी समाज का भगवान बदरी विशाल से जुड़ा यह प्रतीक सचमुच अनूठा है. लेकिन प्रसाद की यह कतरन गांव के करघों की तकदीर नहीं बदल सकी. आज सारी श्रमशीलता को ग्रहण सा लग गया है. व्यास गुफा के निकट अपने आसननुमा दनों को बिक्री के लिए सजाकर बैठी वह महिला मुझसे बातचीत में यही दर्द बांट रही थी. इस बीच गुफा के दर्शन कर लौटते एक परदेसी जोड़े को देखकर उसने अनुरोध किया कि मैं इस जोड़े को पास बुलाऊं और आसन खरीदने के लिए मनाऊं. मैंने आवाज देकर उन्हें पास तो बुला लिया और सूक्ष्म परिचय पाने के बाद उनसे खरीदारी का आग्रह भी किया. युगल चंडीगढ़ का था. दोनों ने मेरी बात का मान रखते हुए आसन को उलटा-पुलटा जरूर और थोड़ा मोल-भाव भी किया, पर खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

संयोग से मेरे बैग में सुबह मंदिर से प्राप्त प्रसाद में मौजूद घृत लगी वह कतरन मौजूद थी. मैंने इसे निकालकर भगवान बदरी विशाल से जुड़े माहात्म्य को संक्षेप में इस जोड़े को समझाया और कहा कि प्रसाद रूप में इस आसन को खरीदकर वे इस दूरस्त इलाके के स्त्री समाज की उद्यमशीलता में कहीं न कहीं साहस भर सकते हैं. शायद मेरी बात उनको रीझ गई. पत्नी ने दाम पूछे और बगैर मोलभाव किए रुपये महिला की मुट्ठी में रख दिये. उन्होंने आसन को माथे से लगाकर हाथ जोड़ते हुए खुशी-खुशी विदा ली. थोड़ी देर बाद मैं भी गंतव्य की ओर बढ़ चला.

व्यास गुफा से भी ऊपर सरस्वती नदी की ओर बढ़ते हुए यही सोचने लगा कि सुबह मंदिर के कपाट खुलते वक्त जो दर्शन किए थे, वे कितने फलीभूत हुए और जो प्रसाद पाया, उसका असल स्वाद कितना मीठा था. लेकिन यह कसक बाकी थी कि मंदिर के प्रसाद वाली थाली में बाहर से आने वाले सूखे मेवों और चना-लैची के दानों के बीच काश, माणा की बुनकरी का हुनर भी स्थायी जगह बना पाता!