चकराता,भारत की जनजातीय क्षेत्रों में आज भी वर्षों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है. एक ही ऐसी ही परंपरा उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में आज भी जीवित है. यहां हर तीज-त्योहार और शादी एवं मौण मनाने के अनूठे रिवाज है. इस बार यहां करीब 27 सालों के बाद बणगांव खत द्वारा खतनू नदी में चार जून को मच्छ मौण आयोजित किया जा रहा है. मेले में 10-15 हजार लोगों के हिस्सा लेने की संभावना है. इसे लेकर लोगों में काफी उत्साह है और उन्होंने इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई है.

गौरतलब है कि चकराता ब्लॉक के बणगांव खत के 14 गांवों के ग्रामीणों ने महापंचायत में इस साल मौण मेले के आयोजन का निर्णय लिया है. यह मेला खतनू नदी में 4 जून को आयोजित किया जाएगा. वर्षों पुरानी इस परंपरा अब खत्म सी होती जा रही है. इसका पता इस बात से चलता है कि मैपावटा निवासी पंडित केशवराम जोशी ने बताया कि, 75 साल की उम्र में उन्होंने मात्र तीन बार ही मौण मेला देखा है. उनका मानना है कि सालों बाद मौण मेले के आयोजन से आज की युवा पीढ़ी इसके महत्व को जान सकेगी.

आपको बता दें कि जौनसार-बावर में दो तरह के मौण मेले का आयोजन किया जाता है, जातरु मौण और मच्छ मौण. खतनू नदी में 4 जून को मच्छ मौण में पौराणिक परंपरा के तहत बणगांव खत स्याणा परम सिंह मिल्कीराम ने तपलाड़ स्याणा को निमंत्रण के रूप में जोड़ी भेजी है. स्याणा ने बताया कि मौण की तैयारियां हो चुकी है. टिमरु पाउडर भी तैयार कर लिया गया है. चार जून को ठीक 11 बजे खतनू नदी में टिमरु पाउडर डालने के साथ ही मौण मेला शुरू हो जाएगा. 27 साल बाद हो रहे मच्छ मौण में क्षेत्र की आठ खतों द्वार, बिशलाड, मोहना, बोंदूर, अठगांव, कोरु, बहलाड़ के ग्रामीण भाग लेंगे। बणगांव खत ने पूरे क्षेत्र के लोगों को मौण मेले में आने का निमंत्रण भेजा है. लोक संस्कृति के प्रतीक मौण मेले में शामिल लोगों में मछलियां पकड़ने का विशेष उत्साह होता है.

पानी में टिमरु पाउडर डालने से मछलियां बेहोश हो जाती हैं, जिन्हें पकड़ना आसान हो जाता है. बणगांव खत का मच्छ मौण चार भागों में होता है. खतनू नदी में दारमोठी, बडौल, दोबायूं, डुंगियारा में अलग-अलग टिमरु पाउडर डाला जाता है, जिसके बाद मौण मेले में भाग लेकर लोग नदी में मछलियां पकड़ने में जुट जाते है. मच्छ मौण देखने के लिए उत्तरकाशी, पछवादून, टिहरी से भी लोग आाते है.