इस गांव के लोगो ने पारंपरिक घरो की परंपरा को जिन्दा रखा है

गोपेश्वर, आजकल लोग चाहें वह गांव के हो या शहर के,चकाचौंध की ओर भाग रहे है.जाहिर है सुदूर पहाड़ भी इस भेड़चाल से कैसे अछूता रह सकता है. सीमांत चमोली जिले में ही देखिए, हर ओर कंक्रीट के जंगल नजर आते हैं. लेकिन, इस सबके बीच जिले की सुदूरवर्ती गांव रामणी ने अपनी पहचान को मिटने नहीं दिया. यहां ग्रामीण आज भी सीमेंट-कंक्रीट के नहीं, बल्कि पारंपरिक पठालों (पत्थरों) के मकानों में ही रहना पसंद करते हैं.

चमोली जनपद के घाट ब्लाक मुख्यालय से 32 किलोमीटर दूर रामणी गांव तक वर्ष 2012 में सड़क पहुंच चुकी है, लेकिन सरिया-सीमेंट आज भी नहीं पहुंचते. जबकि, जिले में जोशीमठ, गोपेश्वर, चमोली, कर्णप्रयाग, पीपलकोटी आदि नगर-कस्बों में सीमेंट-कंक्रीट का जाल बिछता जा रहा है.

ऐसे दौर में रामणी के लोगों का परंपरा को सहेज कर रखना अनुकरणीय तो है ही. रामणी के लोग चाहते तो सड़क सुविधा मिलने के बाद बाजार से सरिया-सीमेंट लाकर अपने मकानों को आधुनिक कलेवर में ढाल सकते थे. लेकिन, उन्होंने पठालों के मकानों को ही तवज्जो दी.

यही वजह है कि 200 परिवारों वाले इस गांव में हर ओर पठालों के मकान ही नजर आते हैं. हां, पंचायत भवन समेत कुछ सरकारी भवनों में जरूर सीमेंट-सरिया का प्रयोग हुआ है. भवन की नींव खोदकर मिट्टी और पत्थरों से भरा जाता है. चिनाई के बाद लकड़ी की बल्लियों पर लकड़ी चीर कर (तख्ते) बिछाई जाती है. उसके ऊपर घास और मिट्टी डाली जाती है. इसके बाद टॉप में पठाल बिछाई जाती है