देशभर में ‘मोदी लहर पैदा करने वाले’ प्रशांत किशोर की रणनीति नहीं आई कांग्रेस के काम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीतिक ब्रांड बनाने और बिहार में महागठबंधन के लिए कट्टर दुश्मनों लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को एक साथ लाने का श्रेय चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को दिया जाता है. लेकिन उनका जादू उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस के काम न आया और दोनों ही जगहों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.

जब कांग्रेस ने किशोर की सेवाएं उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए ली, तो प्रदेश में कांग्रेसियों ने उनका स्वागत नहीं किया और हर कदम पर उनके फैसलों को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. चाहे वह 78 वर्षीय शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना हो या फिर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करना.

यहां तक कि अभिनेता से नेता बने उत्तर प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेता राज बब्बर ने उन्हें ‘साउंड रिकार्डिस्ट’ करार दे दिया. बब्बर ने कहा, ‘वे यहां चुनावों के दौरान पार्टी की विचारधारा को आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने के लिए आए हैं.’

उन्होंने सपा-कांग्रेस गठबंधन की तरफ से राहुल गांधी और अखिलेश यादव के साथ मिलकर रोड शो करने की योजना बनाई तथा ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ जैसे जुबान पर चढ़नेवाले नारे भी बनाए.

लेकिन मोदी लहर के आगे यह जोरदार अभियान पूरी तरह असफल रहा. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड दोनों ही जगहों पर कांग्रेस असफल रही.

राजनीतिक विश्लेषकों और कांग्रेसी नेताओं ने स्वीकार किया कि किशोर की रणनीति असफल हुई है, लेकिन अकेले किशोर पर इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली.

एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि अकेले किशोर पर हार का ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता. उन्होंने बताया, ‘2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश के 328 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की थी. यह स्पष्ट है कि हमारी रणनीतियां असफल हुई हैं, जबकि भाजपा अपनी योजनाओं और उसके कार्यान्वयन को लेकर काफी सर्तक थी. लेकिन इसका किसी अकेले व्यक्ति को दोष देना सही नहीं होगा. इस हार की जिम्मेदारी किसकी है, इस पर पार्टी नेतृत्व को सामूहिक जबाव देना है.’

विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) के प्रवीण राय ने बताया, ‘उत्तर प्रदेश के नतीजों ने यह साबित किया है कि प्रशांत किशोर जैसा व्यक्ति भी गलत हो सकता है और यह स्पष्ट है कि उनकी रणनीतियां विफल हुईं. लेकिन उन्हें पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता. यह जिम्मेदारी नेतृत्व की है.’

वहीं, पंजाब की जीत कांग्रेस के लिए राहत बनकर आई है. लेकिन विशेषज्ञ इसका श्रेय प्रशांत किशोर की बजाय अमरिंदर सिंह को देते हैं, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चुनाव अभियान का नेतृत्व किया.

ट्विटर पर भी प्रशांत किशोर का मजाक उड़ाया जा रहा है. अभिनेता से भाजपा सांसद बने परेश रावल ने ट्वीट कर कहा, ‘क्या किसी को पता है कि प्रशांत किशोर कहां हैं.’ अन्य यूजर्स ने व्यंग्य करते हुए ट्वीट किया, ‘क्या प्रशांत किशोर ने लिंक्डइन पर अपना रेज्यूमे अपलोड किया है?’

लेकिन सेफोलॉजिस्ट यशवंत देशमुख का कहना है कि किशोर हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे. देशमुख ने बताया, ‘आप तभी बेच सकते हैं जब आपके पास बेचने के लिए कुछ हो. कांग्रेस की हालत यूपी में पहले से ही काफी खराब थी. इसलिए अकेले प्रशांत किशोर को दोषी ठहराना गलत होगा.’