अजीब दास्तां है ये! जीते तो विपक्ष में बैठे, हारे तो बन गई सरकार!

चुनाव में जीत ही राजनीति में सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय कराती है. लेकिन कई बार कुछ ऐसे संयोग बन जाते हैं, जब एक पार्टी के नेता अपनी ही पार्टी के नेता के हारने को खुद के लिए गुड लक मानने लगते हैं. वैसे तो सियासत से जुडे हर शख्स के लिए सत्ता अहमियत रखती है, लेकिन कुछ नेताओं का इत्तेफाकन या फिर कहें कि बदकिस्मती से सत्ता से बैर रहा है.

दरअसल हम बात कर रहे हैं उस बदकिस्मती कि, जिसके अनुसार जब-जब ये महानुभाव विधानसभा चुनाव जीते तब-तब उनकी पार्टी को सत्ता ही नसीब नहीं हुई और जब उनकी पार्टी ने सरकार बनाई तो वे चुनाव हार गए.

भले ही ये बातें कुछ अटपटी लग रही हों, लेकिन उत्तराखंड में कुछ नेताओं की किस्मत ऐसी ही रही है. सबसे पहले बात करते हैं मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भटट की. जो उत्तराखंड गठन के बाद हुए 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनावों में रानीखेत सीट से खुद तो जीत गए, लेकिन उनकी पार्टी हार गई और सरकार कांग्रेस की बन गई.

इसके बाद साल 2007 में दूसरे विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने सत्ता में वापसी की, लेकिन अजय भट्ट रानीखेत में बेहद करीबी मुकाबले में चुनाव हार गए. इसी तरह 2012 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट चुनाव तो जीत गए, लेकिन उत्तराखंड में सरकार कांग्रेस की बन गई थी. अब एक बार फिर भट्ट मौजूदा यानि चौथे चुनाव में अपनी पारंपरिक रानीखेत सीट से चुनावी मैदान में हैं. भटट का मानना है कि ये सच है कि राज्य गठन के बाद ये इत्तेफाक उनसे जुड़ा है, लेकिन इस बार ये सिलसिला टूट जाएगा.

अब बात कांग्रेस की करें तो, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय की किस्मत भी उनके साथ कुछ ऐसी ही आंखमिचौली खेलती है. मौजूदा विधानसभा यानि 2012 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी की सरकार बनी, लेकिन वे खुद टिहरी सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश धन्नै से मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे.

इसके पहले किशोर साल 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में टिहरी से विधायक तो निर्वाचित हुए थे, लेकिन उत्तराखंड में सरकार भारतीय जनता पार्टी की बनी थी. खास बात ये है कि राज्य गठन के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनावों में किशोर टिहरी सीट से पहली बार विधायक बने और तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार में राज्य मंत्री भी बन गए, लेकिन मंत्रीमंडल का आकार सीमित करने लिए बने कानून के तहत हुई छटनी में उन्हें मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा था.

इस बार किशोर उपाध्याय पारंपरिक टिहरी सीट छोडकर देहरादून जिले में सहसपुर से चुनाव लड रहे हैं. पार्टी प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का दावा है कि किशोर न सिर्फ ये चुनाव जीतेंगे बल्कि कांग्रेस सरकार का हिस्सा भी बनेंगे.

अजय भटट और किशोर उपाध्याय की किस्मत का सत्ता से बैर किसी से छिपा नहीं है. लेकिन नारायण दत्त तिवारी से दूसरा इत्तेफाक जुडा है. तिवारी साल 2002 में उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बने, जिसके बाद 2007 में विधानसभा चुनाव हुआ, लेकिन कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. ठीक यही सिलसिला उत्तरप्रदेश में रहा था, क्योंकि तिवारी के सीएम रहते कांग्रेस चुनाव हार गई थी.