आज ही के दिन भारत की पहली ट्रेन उत्तराखंड के रुड़की से पिरान कलियर रूट पर चली थी

हमने और आपने हमेशा यही पढ़ा कि भारत में पहली रेल बंबई और थाणे के बीच 1853 में चलाई गई थी. लेकिन बहुत कम लोगों को बता है कि इससे पहले ही भारत में रेल की शुरुआत हो चुकी थी. मजेदार बात यह है कि इसकी शुरुआत देवभूमि उत्तराखंड में ही हुई थी.

जी हां, आपने ऊपर की पंक्तियों में सही पढ़ा है. भारत की पहली रेल बंबई और थाणे के बीच नहीं चली थी. बल्कि भारत की पहली रेल उत्तराखंड में चली थी और वह भी बंबई-थाणे से दो साल पहले. देश में रेल युग की शुरुआत करने वाले उत्तराखंड में आज भी रेल का विस्तार नहीं हो पाया है.

ब्रिटिश काल में बनी भारत की पहली रेलवे लाइन और भाप के इंजन का पहली बार उपयोग रुड़की से पिरान कलियर के बीच किया गया था.

दरअसल 1837-38 में उत्तर-पश्चिमी प्रांत अब उत्तर प्रदेश में भारी सूखा पड़ गया था. इसके चलते ईस्ट इंडिया कंपनी को राहत कार्यों में बड़ी संख्या में धनराशि खर्च करनी पड़ी. कंपनी के अधिकारियों ने इस समस्या से राहत पाने के लिए गंगा से नहर बनाने की तैयारी शुरू की.

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लेकिन बीच में पड़ने वाली सोनाली नदी के ऊपर से नहर निकालना बड़ी समस्या थी. इसके लिए ब्रिटिश इंजीनियरों ने सोनाली एक्वाडक्ट (जलसेतु) बनाकर नहर को नदी के ऊपर से गुजारने की योजना बनाई.

पुल निर्माण के लिए खुदाई करनी थी और इसमें काफी मात्रा में मलबा निकलना था, जिसे कलियर में डालने की योजना बनाई गई. इस मलबे को लाने के लिए रेलवे लाइन बिछाई गई.

इस लाइन पर चलाने के लिए जो वैगन लाई गई उसका नाम प्रांत के तत्कालीन गवर्नर थॉमसन के नाम पर रखा गया. बाद में मशहूर गायिका के नाम पर इसका नाम जेनी लिंड रख दिया गया.

इस तरह भारत की रुड़की और पिरान कलियर के बीच भारत की पहली रेल चली. सार्वजनिक क्षेत्र में इसका उपयोग नहीं होने के कारण देश की पहली रेलवे बंबई से थाणे को ही माना जाता है.