राजधानी गैरसैंण ही नहीं, नए जिलों के गठन को लेकर भी असमंजस में ‘सरकार’

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कभी भी हो सकती है, लेकिन लंबे समय से प्रतीक्षित नए जिलों के गठन पर अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है.

दरअसल, स्थायी राजधानी गैरसैंण बनाने की मांग की तरह सरकार नए जिलों को लेकर इसलिए सांसत में है कि कहीं यह मुद्दा चुनावी लिहाज से फायदे की जगह नुकसान वाला साबित न हो. जिन नए जिलों की घोषणा होगी, वहां तो कांग्रेस सियासी लाभ की उम्मीद कर सकती है, मगर जिन नए जिलों की मांग पूर्ण नहीं होगी, वहां जनमत को समझा पाना खासा मुश्किल काम हो सकता है.

नए जिलों के गठन को लेकर सबकी नजरें कैबिनेट बैठक पर टिकी हुई थी, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. अब अगले दो हफ्तों में कभी भी निर्वाचन आयोग विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर सकता है और इसी के साथ आचार संहिता लागू हो जाएगी. तब सरकार इस तरह का कोई भी निर्णय नहीं ले सकेगी.

इस स्थिति में माना जा रहा है कि सरकार जल्द अगले कुछ दिनों में नए जिलों को लेकर कोई घोषणा कर सकती है. यह घोषणा कुछ वैसी भी हो सकती है, जैसी पिछली बीजेपी सरकार के समय में हुई थी.

साल 2011 के स्वतंत्रता दिवस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने चार नए जिलों के गठन की घोषणा की. इनमें गढ़वाल मंडल में यमुनोत्री व कोटद्वार तथा कुमाऊं मंडल में रानीखेत व डीडीहाट शामिल थे.

इसके कुछ ही दिन बाद सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हो गया और भुवन चंद्र खंडूड़ी को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद सौंपा गया. खंडूड़ी के कार्यकाल में इन चार नए जिलों के गठन का शासनादेश जारी कर दिया गया. नए जिले विधिवत धरातल पर उतर पाते, तब तक विधानसभा चुनाव आ गए.

जनवरी 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दिया तो नए जिलों के गठन का मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया. तब कांग्रेस सरकार ने कमिश्नर गढ़वाल की अध्यक्षता में एक समिति बनाकर उसे नए जिलों के गठन का जिम्मा सौंप दिया.

इस समिति ने राज्य में नए जिलों के गठन के लिए पूर्व में निर्धारित मानकों को शिथिल करने का निर्णय लिया. पहले वर्ष 1991 की जनगणना के आधार पर नए जिले के लिए न्यूनतम 15 लाख की आबादी का मानक था, जिसे समिति ने डेढ़ से दो लाख कर दिया.

इसी तरह न्यूनतम पांच हजार वर्ग किमी क्षेत्रफल के मानक को एक लाख हेक्टेयर, विकासखंडों की न्यूनतम संख्या को 10 से तीन, थानों की संख्या न्यूनतम 12 से तीन और लेखपालों की न्यूनतम संख्या 300 से घटाकर 50 कर दी गई.

इन मानकों के आधार पर समिति ने इसी फरवरी में पौड़ी गढ़वाल जिले में कोटद्वार, उत्तरकाशी जिले में यमुनोत्री, अल्मोड़ा जिले में रानीखेत और पिथौरागढ़ जिले में डीडीहाट को नया जिला बनाने की संस्तुति की.
गौरतलब है कि ये वही चार जिले हैं, जिनके गठन की घोषणा पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार ने की थी. इस बीच सरकार की ओर से पहले आठ और फिर 11 नए जिले बनाने की बात सामने आई.

स्वयं मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 11 नए जिलों के गठन की तैयारी की बात स्वीकारी. फिर कहा गया कि सीमांकन, जनसंख्या निर्धारण, राजस्व सीमा जैसी व्यवहारिक दिक्कतों को देखते हुए फिलहाल उन्हीं जिलों के गठन किया जाएगा, जिनका होमवर्क पूरा हो चुका है.

इतना सब होने के बाद भी सरकार नए जिलों के गठन को लेकर पसोपेश में है. कारण स्पष्ट है कि कुछ विधानसभा सीटों पर तो इसका लाभ मिलेगा, मगर जहां नए जिलों की मांग पूरी नहीं की गई, वहां इसका उलट असर भी पड़ सकता है.

इस स्थिति में अब इस बात की संभावना ज्यादा नजर आ रही है कि पिछली बीजेपी सरकार की तरह मौजूदा कांग्रेस सरकार भी एक साथ 10-11 नए जिले बनाने की घोषणाभर कर दे और इन्हें धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी आने वाली सरकार पर छोड़ दी जाए.

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के मुताबिक पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार के समय बने चार जिलों के गठन का शासनादेश जल्द पुनर्जीवित किया जाए. निकट भविष्य में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाएगी, लिहाजा शीघ्र इन जिलों को अस्तित्व में लाया जाए.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने कहा कि नए जिलों का गठन का मुद्दा पार्टी के पिछले चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा है. इस लिहाज से नए जिले तो बनाए ही जाएंगे. अभी तो कैबिनेट की कुछ और बैठकें होंगी, उनमें नए जिलों के गठन का प्रस्ताव लाया जा सकता है.