कांग्रेस-बीजेपी के बीच सियासी फुटबॉल बनकर रह गई प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण

पिछले 16 सालों में राज्य की स्थाई राजधानी का मामला सियासत की देहरी खूब उछला, इससे नेताओं ने राजनीतिक रोटियां भी खूब सेकीं, लेकिन जनमानस की भावनाओं के साथ न्याय आज तक नहीं हो पाया. राज्य बनने के बाद पहाड़ के राजनेताओं का अस्थायी राजधानी देहरादून में ऐसा मन रमा कि गैरसैंण को ग़ैर बनाए रखने में किसी भी पार्टी और नेता ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

एक अलग पर्वतीय राज्य के रूप में उत्तराखंड का गठन 9 नवबंर 2000 को जरूर हुआ, लेकिन पहाड़ी राज्य की राजधानी कहां होगी ये फैसला राज्य आंदोलनकारी बहुत पहले कर चुके थे. लंबे संघर्ष के बाद उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए गैरसैंण को राजधानी के रूप में चुना गया था. लेकिन राज्य बनने के बाद स्थाई राजधानी का मुद्दा चुनावी जुमलेबाजी से आगे नहीं बढ़ पाया. चाहे सत्ता में बीजेपी रही हो या कांग्रेस गैरसैंण पर बातें सबने कीं, लेकिन निर्णय लेने का साहस कोई नहीं दिखा पाया.

मार्च 2012 में राज्य की सत्ता पर क़ाबिज़ हुई कांग्रेस ने गैरसैंण को नए सिरे से सतह पर ला दिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद गाहे-बगाहे अपनों के हमलों से घिरे रहने वाले विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में शरण लेने की ठानी. बहुगुणा ने मुख्यमंत्री रहते तात्कालिक सियासी हालातों से पार पाने और हरदा कैंप के हमलों को भोथरा करने को गैरसैंण कार्ड खेला.

गैरसैंण में अब तक
– तीन नवंबर 2012 को बहुगुणा कैबिनेट की गैरसैंण में बैठक हुई.
– 15 जनवरी 2013 को विधानभवन का शिलान्यास हुआ.
– 9 नवंबर 2013 को भराड़ीसैंण में विधानभवन भूमि पूजन.
– जून 2014 में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पहला विधानसभा सत्र बुलाया.
– साल 2015 में दूसरे विधानसभा का सत्र आयोजन कराया गया.
– 17-18 नवंबर, 2016 को भराड़ीसैंण विधानभवन में गैरसैंण का तीसरा सत्र आयोजित हुआ.

2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने केन्द्र में मंत्री रहते लगातार लेटर बम फोड़ रहे हरीश रावत और उनके कैंप के विधायकों को क़ाबू करने के लिए गैरसैंण का मास्टरस्ट्रोक खेला था. गैरसैंण राजधानी बनेगी इसे लेकर कुहासा तब भी छाया हुआ था और विधानभवन बनाकर तीन सत्र आयोजित कराने का श्रेय ले रही रावत सरकार भी तस्वीर साफ करने में नाकाम रही है.

दरअसल कांग्रेस और मुख्यमंत्री हरीश रावत यह जानते हैं कि ताज़ा राजनीतिक हालात में जब चुनाव नजदीक हैं तब गैरसैंण पर बड़ा फैसला लेना गरम दूध साबित हो सकता है. लेकिन जानकार ये भी तर्क देते हैं कि गैरसैंण पर इतना आगे बढ़ने के बाद अब कदम ठिठकना भी हरदा के लिए फटा दूध न बन जाए.

ऐसे समय जब बीजेपी परिवर्तन यात्रा के जरिए सत्ता का सिरमौर बनने निकल पड़ी है तब मुख्यमंत्री हरीश रावत ने वाया गैरसैंण दोबारा देहरादून पहुंचने का दांव चला है. हरदा का आरोप है कि बीजेपी ने राज्य गठन के समय ही स्थाई राजधानी का मुद्दा उलझा दिया.

हरदा गैरसैंण रोडमैप की बात कर चरणबद्ध तरीके से राजधानी का मुद्दा हल करने की दलील दे रहे हैं. जबकि बीजेपी ने गैरसैंण सत्र के पहले दिन ही आक्रामक रुख अपनाते हुए सरकार को स्थायी या अस्थायी, शीतकालीन या ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के मुद्दे पर खुला साथ देने का दावा कर सरकार से तस्वीर साफ करने की मांग की.

बीजेपी की सियासी गुगली को भांपकर सरकार ठिठक गई है. सरकार अब गैरसैंण में अवस्थापना विकास को पहली सीढ़ी बताकर भविष्य दिखाने की कोशिश कर रही है. लेकिन लोगों को उम्मीद थी कि जाते-जाते सरकार ग्रीष्मकालीन राजधानी या कम से कम जिले का तोहफ़ा देगी.

गैरसैंण के मुद्दे पर पूरी तरह से पाक साफ न कांग्रेस नजर आ रही है और ना बीजेपी ही. बीजेपी ने खुला समर्थन कर रावत सरकार को असहज जरूर कर दिया. लेकिन आखिरी सत्र में विपक्ष के पूरे विधायकों का न पहुंचना और फिर सत्र के पहले दिन ही लौट जाना सवाल खड़े कर रहा है. जबकि गैरसैंण पर विपक्ष की मांग पर सरकार का चुप्पी साध जाना भी संदेह पैदा करता है. उससे पहले विधानभवन को राज्य अतिथि गृह बनाने के जीओ जारी करना भी सरकार की मंशा को दर्शाता है.

दरअसल, सीटों के समीकरण में पहाड़ पर मैदान-तराई का भारी पड़ते जाना और उस पर पहाड़ के नेताओं का भी मैदानी राजनीति में भविष्य तलाशना राजनीतिक इच्छाशक्ति के कमजोर साबित होने की सबसे बड़ी वजह मानी जा सकती है.

बहरहाल, गैरसैंण पहाड़ के विकास का एक असल मानचित्र साबित हो सकता है, बशर्ते सियासत चुनावी रोडमैप के फ़्रेम के बाहर झांककर उम्मीदों के इस फलक को देखने की हिम्मत पैदा कर सके.