पौड़ी : कालागढ़ के लोगों ने राष्ट्रपति से लगाई इच्छा मृत्यु की गुहार, पढ़ें क्यों?

वन विभाग की भूमि पर सिंचाई विभाग की ओर से बसाए गए कालागढ़ शहर के निवासी अब विस्थापित किए जाने से इतने आहत हैं कि अब उन्होंने राष्ट्रपति से अब इच्छा मृत्यु की मांग की है.

दरअसल, वन विभाग के निर्देश पर प्रशासन की ओर से कालागढ़ में सालों से निवास करने वाले 751 परिवारों को अवैध अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए उन्हें कालागढ़ में सरकारी भवन खाली करने का फरमान सुना दिया है, जिसके चलते इन परिवारों पर सड़क पर आने का खतरा मड़रा गया है.

हालांकि कालागढ़ को खाली करने का मामला एनजीटी में विचाराधीन चल रहा है, लेकिन वन विभाग की एक तरफा कार्रवाई और छत छिन जाने के खतरे को देखते हुए अब यहां के निवासियों ने राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई है.

कालागढ़ में सालों से निवास करने वाले 751 परिवारों को सिंचाई विभाग की ओर से अवैध अतिक्रमणकारी घोषित करने के बाद अब इन परिवारों पर सरकारी भवनों से बेदखली की तलवार लटकने लगी है.

दरअसल, कालागढ़ में पिछले 6 दशकों से निवास करने वाले इन लोगों ने राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाते हुए कहा है कि या तो उन्हें कालागढ़ से कहीं पुर्नावासित कर दिया जाए या फिर उन्हें इच्छा मृत्यु दे दी जाए.

शुक्रवार को कोटद्वार की सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए कालागढ़ के इन लोगों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि उनके पास कहीं पर भी एक इंच जमीन रहने के लिए नहीं है. ऐसे में यदि कालागढ़ शहर को उजाड़ा जाता है तो वह अपने परिवार के साथ कहां जाएंगे.

हालांकि मौजूदा सरकार ने कालागढ़ को बचाने के लिए दो साल पहले उसे नगर पंचायत का दर्जा भी दिया, लेकिन यह दर्जा सचिवालय की फाइलों से अब तक भी बाहर नहीं निकल पाया है.

उधर दूसरी ओर कॉर्बेट नेशनल पार्क की सीमा से लगे कालागढ़ शहर को वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हुए वन विभाग ने इसे अपनी भूमि से खाली करने के लिए सिंचाई विभाग को फरमान सुना दिया. जिसके चलते अब ग्रामीणों ने अपने जनप्रतिनिधियों के साथ वन विभाग के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है.

उधर दूसरी ओर भाजपा के पूर्व विधायक शैलेन्द्र सिंह रावत ने कालागढ़ वासियों को लेकर 11 नवंबर को कोटद्वार तहसील में विशाल प्रदर्शन कर जता दिया कि कालागढ़ को खाली करना इतना आसान नहीं है. शैलेन्द्र रावत ने राज्य सरकार से मांग करते हुए कहा कि जब तक कालागढ़ के लोगों का पुर्नवास नहीं किया जाता तब तक उनको बेघर करना सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है.

बहरहाल कालागढ़ शहर का भविष्य क्या होगा यह बता पाना भले ही मुश्किल हो, लेकिन इतना तो तय है कि बिना पुर्नवास के जनता कालागढ़ खाली करने वाली नहीं है. क्योंकि मामला अभी एनजीटी में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट पहले ही यहां के प्रभावित ग्रामीणों के पुर्नवास के दिशा निर्देश जारी कर चुका है.

ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि अपने आसियाने के लिए इच्छा मृत्यु की गुहार लगाते ग्रामीणों की मांग पर सरकार कितना ध्यान देती है और कब तक इनको राहत प्रदान करती है.