उत्तराखंड स्थापना दिवस पर विशेष : 16 साल, 8 मुख्यमंत्री, खाली गांव और ढेरों सपने

उत्तराखंड को अलग राज्य बने 16 साल हो चुके हैं. 17वें साल की युवा अवस्था में कदम रख रहा है अपना उत्तराखंड. इन 16 सालों का लेखा-जोखा तैयार किया जाए और क्या खोया, क्या पाया का हिसाब लगाया जाए तो अब भी शहीदों के सपनों का उत्तराखंड कोसों दूर तक नजर नहीं आता.

शहीदों को श्रद्धांजलि
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सबसे पहले पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए अपनी जान गंवाने वाले शहीदों को प्रणाम व श्रद्धांजलि. खटीमा गोलीकांड, मसूरी गोलीकांड और रामपुर तिराहा (मुजफ्फरनगर) कांड जैसी कई घटनाओं में उत्तराखंड की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिनमें कई लोग शहीद हो गए. रामपुर तिराहा कांड में तो दो अक्टूबर (गांधी जयंती) की रात आंदोलनकारियों को गोलियों से भून दिया गया और महिला आंदोलनकारियों के साथ बलात्कार जैसी घिनौनी हरकतें की गईं.

16 साल में 8 मुख्यमंत्री
इन 16 सालों में उत्तराखंड को जो चीज सबसे ज्यादा मिली वह हैं मुख्यमंत्री. सिर्फ 16 साल में ही उत्तराखंड को अब तक कुल 7 मुख्यमंत्री मिल चुके हैं जिनके कुल 8 कार्यकाल हो चुके हैं. (भुवन चंद्र खंडूरी के दो कार्यकाल हो चुके हैं). इसके अलावा मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में एक बार राष्ट्रपति शासन का दंश भी राज्य को झेलना पड़ा है. इस तरह से हरीश रावत के भी दो कार्यकाल लगाये जाएं तो कुल 9 मुख्यमंत्री देख चुका है राज्य इन 16 सालों में।

नित्यानंद स्वामी – 9 नवंबर 2000 से 29 अक्टूबर 2001 तक 
भगत सिंह कोश्यारी – 30 अक्टूबर 2001 से 1 मार्च 2002 तक
नारायण दत्त तिवारी – 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक
भूवन चंद्र खंडूरी – 8 मार्च 2007 से 23 जून 2009 तक
रमेश पोखरियाल निशंक – 24 जून 2009 से 10 सितंबर 2011 तक
भूवन चंद्र खंडूरी – 11 सितंबर 2011 से 13 मार्च 2012 तक
विजय बहुगुणा – 13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014 तक
हरीश रावत – 1 फरवरी 2014 से अब तक

सड़कों का जाल बिछा
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पिछले 16 साल में समूचे उत्तराखंड में सड़कों का जाल बिछाने का काम बड़ी ही तेजी से हुआ है और अब भी चल रहा है. घर तक सड़क पहुंचने से जहां लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी आसान हुई है वहीं शहरी संस्कृति, अपराध और पलायन भी बढ़ा है.

उद्योग धंधों में चमक
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में उद्योग धंधे भी चमके हैं. लेकिन दुख की बात यह है कि यह सभी उद्योग घंधे तराई क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह गए हैं. इस तरह से अब भी लोगों को रोजगार के लिए अपना घर, अपना गांव छोड़कर तराई के इलाकों में आना पड़ रहा है. उत्तराखंड की मांग के सबसे बड़े कारणों में से एक यह भी था कि यहां के युवाओं को रोजगार की तलाश में अपना घर, अपना गांव न छोड़ना पड़े, लेकिन यह अब तक नहीं हो पाया है. पहाड़ में अब भी उद्योग घंधे नहीं हैं.

सपनों की राजधानी गैरसैण
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पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने 1994 में जिस वक्त आंदोलन जबरदस्त उग्र रूप ले चुका था, उसी समय गैरसैण को राजधानी घोषित कर दिया था. गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग के पीछे मुख्य कारण पहाड़ का विकास है. पहाड़ी राज्य की राजधानी भी पहाड़ में होनी चाहिए, यही आंदोलनकारियों की भी मांग थी और आज भी उत्तराखंड के लोग यही मानते हैं. चमोली जिले में स्थित गैरसैण राज्य के बीचोंबीच, पहाड़ पर स्थित है. यहां पहुंचना राज्य के किसी भी कोने से आसान है, जबकि अस्थायी राजधानी देहरादून एक कोने में है और पिथौरागढ़ आदि दूरदराज के इलाकों से काफी दूर है. इसके अलावा देहरादून पहले से ही बड़ा शहर है और विकसित है. गैरसैण राजधानी बनने से यहां रोजगार का सृजन होता. नेताओं के आने जाने के लिए अच्छी-अच्छी सड़कें, हेलिपैड और हवाईअड्डा व रेल सुविधा जैसी कई सुविधाएं यहां को लोगों को भी मिल पाती. लेकिन नेताओं ने बड़ी चालाकी से देहरादून को अस्थायी राजधानी बना लिया, अब वहीं अड्डा जमाकर बैठ गए हैं और अब वे पहाड़ नहीं चढ़ना चाहते.

रुकने की बजाय बढ़ गया पलायन
माना गया था कि उत्तराखंड राज्य बनने से विकास का पहिया पहाड़ी गांवों तक भी पहुंचेगा और पलायन रुकेगा. लेकिन सड़कों का जाल बिछने से पलायन और ज्यादा बढ़ गया है. एक कहावत है कि ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम नहीं आते’. जिस तरह से पानी नीचे की तरफ बहते हुए पहाड़ छोड़कर तराई और मैदानी इलाकों की तरफ बढ़ जाता है उसी तरह पहाड़ के युवा भी प्रौढ़ होते ही रोजगार की तलाश में मैदानी इलाकों का रुख करने लगते हैं. पहाड़ में सीमित संसाधन, रोजगार की कमी और शहरी जीवन का आकर्षण ये सब चीजें युवाओं को मैदानी इलाकों की तरफ खींच ले जाते हैं और फिर वे पहाड़ से कम ही वास्ता रखते हैं.

रेल का सपना अब भी सपना ही है
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चाहे हिमाचल हो या उत्तर-पूर्व के राज्य या अब जम्मू-कश्मीर हर जगह पहाड़ों में रेल पहुंच गई है. लेकिन उत्तराखंड इस मामले में काफी पिछड़ गया है. बागेश्वर, कर्णप्रयाग, भिकियासैण, गैरसैण, मसूरी, धनोल्टी, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, रानीखेत, पिथौरागढ़, लैंसडौन और ऐसे ही कई अन्य जगहें हैं जो अब भी रेल का इंतजार कर रहे हैं. अलग-अलग मौकों पह यहां के लोग रेलवे लाइन के लिए सांकेतिक आंदोलन भी करते हैं, लेकिन उसका नेताओं पर कोई असर नहीं पड़ता. जबकि उत्तराखंड में जहां तक फिलहाल रेलवे लाइनें हैं, वे सब अंग्रेजों की बिछायी हुई हैं. देश को आजाद हुए 70 साल और उत्तराखंड बने 16 साल हो चुके हैं, लेकिन पहाड़ में ट्रेन एक इंच आगे नहीं बढ़ी है. कोटद्वार-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन पर जरूर बात कुछ आगे बढ़ी है, लेकिन अब भी यह रेलवे लाइन भी सपना ही साबित हो रही है.

रिवर्स पलायन
मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है कि विकास का पहिया गांव-गांव तक पहुंच रहा है और अब पहाड़ में रिवर्स पलायन हो रहा है. अथार्त जो लोग पहाड़ छोड़कर चले गए थे वे वापस लौट रहे हैं. कुछ हद तक तो यह बात सही है, लेकिन इसे पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता. कुछ प्रतिभावान युवा पहाड़ लौटकर अपने पूर्वजों की धरती से जुड़कर उत्तराखंड का नाम रोशन कर रहे हैं. जबकि अधिकतर बुजुर्ग लोग जो अपने रोजगार से रिटायर हो चुके हैं वहीं वापस लौट रहे हैं. रिवर्स पलायन की एक सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग उत्तराखंड वापस लौट तो रहे हैं, लेकिन पहाड़ नहीं जा रहे. बल्कि उन्होंने अपना आशियाना और ठिकाना कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, हरिद्वार, रुद्रपुर, टनकपुर देहरादून जैसे तराई के इलाकों में बना लिया है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि शहीदों के सपनों का उत्तराखंड अब भी कोसों दूर है और इस ओर कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति भी नहीं दिखती. अच्छा होता नेता हिम्मत दिखाकर देहरादून का लालच छोड़ देते और गैरसैण को राजधानी बनाकर पहाड़ वापस आने की नजीर पेश करते. फिर उनके पीछे-पीछे पलायन कर चुके लोग भी लौटने पर गंभीरता से विचार करते और लौट आते. आज तो डॉक्टर व शिक्षक भी पहाड़ नहीं चढ़ना चाहते. कोई न कोई बहाना बनाकर वे तराई व मैदानी भागों में अपनी पोस्टिंग करवा रहे हैं.

दिगपाल सिंह (स्वतंत्र पत्रकार)
लेखक हिन्दुस्तान, आजतक और एनडीटीवी जैसे संस्थानों के साथ बरसों तक काम कर चुके हैं और फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार हैं.