16 साल का हुआ उत्तराखंड, 4 हजार से ज्यादा गांवों को आज भी सड़कों का इंतजार

उत्तराखंड को अगल राज्य बने 16 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन हालात ये हैं कि आज भी 4151 गांवों में सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं. हालांकि राज्य गठन के बाद सड़क निर्माण की रफ्तार तो जरूर बढ़ी है, लेकिन दूरस्थ पहाड़ में आज भी लोगों को सड़क का इंतजार है.

बीजेपी और कांग्रेस के बीच आठ बार सत्ता परिवर्तन हो चुका है. मजेदार बात यह है कि सडकों के मामलों में कुमाऊं और गढ़वाल का भेद भी नहीं है, क्योंकि अल्मोडा, पिथौरागढ, पौड़ी और चमोली जिलों में सबसे अधिक सड़क विहीन गांव हैं.

कहने की जरूरत नहीं है कि 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य बन गया था, लेकिन राज्य गठन के बाद भी दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में सड़क सरीखी मूलभूत सुविधा का भारी टोटा है. उत्तराखंड में कुल आबाद गांवों की संख्या 15638 है. जिसमें सड़क से जुड़े गांवों की कुल संख्या 11487 है. 4151 गांवों को आज भी सड़क का इंतजार है.

पीडब्लूडी के विभागाध्यक्ष एच.के. उप्रेती दिलासा दे रहे हैं कि उत्तराखंड बनने के बाद हर साल करीब डेढ़ सौ किलो मीटर की रफतार से सड़कें बन रही हैं उनका दावा है कि एक हजार से ज्यादा ग्रामीण सड़के आगामी एक साल के भीतर मंजूर हो जाएंगी.

राज्य गठन के बाद गुजरे 16 सालों के दौरान कांग्रेस और बीजेपी के बीच सत्ता परिवर्तन हो चुका है, लेकिन दूरस्थ पहाड़ों के इन गांवों में उनकी तरक्की के लिए जरूरी उम्मीदों की सड़क नहीं पहुंचा पाई है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर उत्तराखंड में उम्मीदों के मुताबिक दूरस्थ पहाड़ी गांवों तक सरकारी सड़क क्यों नहीं पहुंच पाई है.

सीमांत चमोली जिले के थराली विधायक जीत राम इसके लिए अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण कानून को जिम्मेदार मानते हैं. लेकिन उनका दावा है कि सूबे के सीएम हरीश रावत की महत्वकांक्षी मुख्यमंत्री सड़क योजना इस स्थिति से उबारने में मददगार साबित होगी. मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह का कहना है कि पिछले कुछ सालों के दौरान गांवों में सडकों को तवज्जो दी गई है और आने वाले समय में हालात बेहतर होंगे.