अल्मोडा : गर्दिश में तांबा बर्तन उद्योग, ताम्रनगरी की पहचान भी खतरे में

कुमाऊं के इतिहास और संस्कृति में खास स्थान रखने वाला अल्मोड़ा शहर कभी ताम्र नगरी के रूप में भी जाना जाता था. बदलते वक्त के साथ ताम्र नगरी की पहचान भी समाप्त हो रही है. कभी 100 से अधिक परिवार तांबे के बर्तन बनाने का काम करते थे. आज कच्चा माल और कम मजदूरी के कारण सिर्फ 5 परिवार ही इस कार्य को कर रहे हैं.

दीपावली नजदीक आते ही अल्मोड़ा के ताबें के बर्तन बनाने वाले लोगों को फुर्सत नहीं होती थी. देर रात तक बर्तन बनाने के लिए टन-टन की आवाजें सुनाई पड़ती थी. चीन ने बाजार में इस कदर कब्जा किया कि आज लोग धन तेरस पर भी तांबे के बर्तन नहीं खरीद रहे हैं. इस तांबे के कार्य को बचाने के लिए सराकर ने प्रोत्साहन शुरू किया है. अब गुरुणाबांज में हरी प्रसाद टम्टा हस्त शिल्प उन्यन संस्थान बनाने की तैयारी चल रही है.

टम्टा मोहल्ले में ताबें का काम करने वाले परिवार अब धीरे-धीरे दूसरे पेशे की तरफ बढ़ रहे हैं. महंगाई की मार के कारण आजकल टम्टा मोहल्ले से लोग तांबे का सामान नहीं खरीद रहें हैं. उत्तराखंड बनने के बाद तेजी के हस्तशिल्प तांबे के कारोबार में कमी आई है.

समय रहते सरकार ने ताम्र नगरी को बचाने का काम नहीं किया तो वह दिन भी दूर नहीं, जब ताम्र नगरी में तांबे के बर्तन बनाने वाला एक भी परिवार नहीं मिलेगा. दीपावली पर गुलजार रहने वाला टम्टा मोहल्ला आज तांबे के बर्तन बनाने के बाद ग्राहकों का इंतजार कर रहा है. अगर इस उद्योग को बचाया जाए, तो युवाओं को रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों का रुख नहीं करना पड़ेगा.