‘उत्तराखंड बनने के 16 सालों का अनुभव बेहद खराब रहा, रुकने की बजाय बढ़ गया पलायन’

पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि सरकारें चाहे किसी भी राजनीतिक दल की रही हों, किसी को गांव की चिंता नहीं है. उत्तराखंड में गांवों को बचाने के बजाय सरकारों ने गांव की जमीनों को बड़े घरानों को बेचने का काम किया. उन्होंने कहा कि रोजगार के साधन मुहैया कराना तो दूर रोजगार भी छीन लिया गया.

हिमालयन यूनिटी मिशन (हम) की ‘गांव बचाओ यात्रा’ के पिथौरागढ़ जिले में बेरीनाग पहुंचने के बाद आयोजित जनसभा में डॉ. जोशी ने कहा कि बेरीनाग व चौकोड़ी की पहचान यहां के चाय बागान थे. लेकिन आज यहां चाय तक नजर नहीं आती. लोगों को अपनी भूमि का मालिकाना हक तक नहीं मिल सका.

उन्होंने कहा कि नैनीसार (अल्मोड़ा) में बाहरी लोगों को गांव की जमीन बेच दी गई. पहाड़ की जनता हक-हकूक के लिए तरस रही है. गांव खाली हो रहे हैं. बुनियादी सुविधाओं के अभाव में तेजी से पलायन हो रहा है. उन्होंने तो यहां तक कहा कि उत्तराखंड राज्य अब केवल मैदानी जिलों (उधमसिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून) तक ही सिमट कर रह गया है.

जनसभा में ईश्वर जोशी ने कहा कि इस बार ग्रामीण जनता को ‘अबकी बारी, गांव की बारी’ का नारा बुलंद करना चाहिए. गांव का विकास ही प्रमुख मुद्दा होना चाहिए. वक्ताओं ने कहा कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है. गांवों के प्रति नजरिया नहीं बदला तो पहाड़ के गांव मिट जाएंगे. राज्य बनने के 16 सालों का अनुभव बेहद खराब रहा है.