टिहरी झील का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में ग्रामीणों ने दी जलसमाधि की धमकी

टिहरी डैम की झील के पानी से टीएचडीसी बिजली उत्पादन कर प्रतिदिन करोड़ों कमा रहा है, लेकिन झील का पानी बढ़ने से आसपास के क्षेत्रों में भूस्खलन और भूधसांव का खतरा भी बढ़ने लगा है. अब टीएचडीसी को झील का जलस्तर 828 मीटर तक ले जाने की अनुमति से भविष्य में खतरा और ज्यादा बढ़ने के आसार हैं. साथ ही झील प्रभावितों ने जलसमाधि की चेतावनी दी है.

टिहरी झील के पानी के उतार चढ़ाव के चलते झील से सटे गांव रोलाकोट, नंदगांव, उप्पू, सिराई, सरोट में सबसे ज्यादा भूस्खलन और भूधंसाव हो रहा है. जिससे प्रभावित ग्रामीण लंबे समय से विस्थापन की मांग कर रहे हैं.

भूस्खलन और भूधंसाव से मकानों में दरारें बड़ी हो गई हैं और कई मकान पूरी तरह जमींदोज़ हो गए हैं. कृषि भूमि में धंसाव के चलते ग्रामीणों को अपने खेत छोड़ने पड़ रहे हैं. आंशिक डूब क्षेत्र के तहत करीब 47 परिवारों का विस्थापन होना है, जिसके लिए ग्रामीण कई बार आंदोलन कर चुके हैं, लेकिन सालों बाद भी विस्थापन नहीं हुआ. अब टीएचडीसी की ओर से झील का जलस्तर 828 मीटर ले जाने की अनुमति मांगी गई है.

विस्थापन संघर्ष समिति के अध्यक्ष सोहन सिंह राणा का कहना है कि झील का जलस्तर बढ़ाने का ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया है और पहले प्रभावित परिवारों के विस्थापन की मांग की है और मांग पूरी नहीं होने पर जलसमाधि की चेतावनी दी है.

हालांकि अभी झील का जलस्तर 824.15 मीटर है और टीएचडीसी को 825 मीटर जलस्तर की अनुमति है, लेकिन दिल्ली में हुई टीएचडीसी, पुर्नवास विभाग और केंद्रीय अधिकारियों की बैठक में टीएचडीसी को कुछ शर्तें पूरी करने को कहा गया है.

पुर्नवास निदेशक इंदुधर बौड़ाई का कहना है कि पहले टीएचडीसी सभी शर्तों को पूरा करेगा, जिसमें जलस्तर बढ़ाने से पहले और बाद में प्रभावित क्षेत्रों में सर्वे सहित सुरक्षा शामिल हैं. जिन्हें पूरा करने के बाद ही जलस्तर 828 मीटर बढ़ाने की अनुमति दी जाएगी.

टिहरी झील के पानी के उतार चढ़ाव के चलते आज झील के आसपास के गांवों में भूस्खलन और भूधंसाव से ग्रामीण डर के साए में जीने को मजबूर हैं और यदि इन्हें विस्थापित नहीं किया जाता है और जलस्तर को बढ़ाया जाता है तो इन क्षेत्रों भारी समस्याएं उत्पन्न होगी. जिसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ये एक बड़ा सवाल है.