हरीश रावत ने की केदारनाथ में मिल रहे नरकंकालों की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की कोशिश

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केदारनाथ त्रासदी को सवा तीन साल गुजर जाने के बावजूद वहां अभी तक नरकंकाल मिलने की जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हुए इसका दोष तत्कालीन मुख्यमंत्री और अपने पूर्ववर्ती विजय बहुगुणा पर डालते हुए कहा कि उन्हीं के आदेश से खोज अभियान बंद किया गया था.

इस संबंध में बगैर किसी का नाम लिए हरीश रावत ने संवाददाताओं से कहा, ‘जो लोग खोज अभियान ठीक तरह से चलाने में राज्य सरकार की विफलता को लेकर जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं, उन्हें मेरी बजाय यह सवाल तत्कालीन मुख्यमंत्री से पूछना चाहिे, जिन्होंने यह अभियान बंद कराया था. मैंने तो इसे दोबारा शुरू करवाया.’

आपदा के बाद लापता लोगों को ढूंढ़ने के लिए पहले अभियान की शुरुआत और अंत तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के कार्यकाल में हुआ था. बहुगुणा अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.

हरदा ने कहा कि यह बहुत विचित्र बात है कि इतनी भयंकर आपदा के बाद शवों की खोजबीन का काम इतना शीघ्र और इस संभावना को ध्यान में रखे बिना खत्म कर दिया गया कि बाढ़ में आए लाखों टन मलबे के नीचे नरकंकाल पड़े हो सकते हैं.

मुख्यमंत्री ने कहा कि फरवरी 2014 में सत्ता संभालते समय उनके सामने शवों की तलाश के लिए केदार घाटी के जंगलों को खंगालें जाने या राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाने के लिए चारधाम क्षेत्र में आधारभूत सुविधाओं के पुनर्निर्माण के असंभव से दिखने वाले कार्य को करने की दोहरी चुनौती थी.’

उन्होंने कहा, ‘मैंने दूसरी चुनौती को चुना और खतरा लिया. हालांकि, आज मैं इस बात को संतोष से कह सकता है कि मेरे प्रयास रंग लाए हैं और हम बाहरी दुनिया को सुरक्षित उत्तराखंड और चारधाम यात्रा का संदेश दे पाने में सफल रहे हैं. इस तथ्य की पुष्टि चारों धामों में आने वाले श्रद्घालुओं की बढ़ती संख्या से हो जाती है. हमने इस संख्या को साल 2018 तक 30-40 लाख तक ले जाने का अपना लक्ष्य निर्धारित किया है.’

मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि केदारघाटी तथा अन्य प्रभावित क्षेत्रों में पूरा पुनर्निर्माण कार्य राज्य सरकार ने सीमित संसाधनों के बावजूद अकेले अपने दम पर किया है और केंद्र ने इसमें उसे कभी कोई सहयोग नहीं दिया.

हरीश रावत ने कहा, केंद्र द्वारा स्वीकृत 8000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज का एक चौथाई हिस्सा भी हमें अब तक नहीं मिला है. फिर भी हमने अपने थोड़े बहुत संसाधनों के बूते पुनर्निर्माण की महान चुनौती हाथ में ली, जिसमें हमें अच्छी सफलता भी मिली.