त्रियुगीनारायण ट्रैक पर नरकंकाल पड़े होने की खबर एक साल से दबाए बैठा है असंवेदनशील वन विभाग

केदारनाथ आपदा के जख्मों को सहला रहे जिस राज्य में अधिकारियों को संवेदनशील होना चाहिए था, उन्होंने संवेदनहीनता की इंतेहा ही पार कर दी. इन दिनों त्रियुगीनारायण-केदारनाथ ट्रैक पर जिन नरकंकालों के मिलने से हड़कंप मचा हुआ है और सरकारी अमला इनकी खोज में जुटा है, इसकी जानकारी केदारनाथ वन प्रभाग को दिसंबर 2015 से ही थी. लेकिन संवेदहीनता की हद यह है कि उन्होंने कभी यह सूचना प्रशासन को देने की जहमत तक नहीं उठाई.

केदारनाथ वन प्रभाग की प्रभागीय वन अधिकारी नीतू लक्ष्मी एम ने स्वीकार किया कि ‘उप प्रभागीय वनाधिकारी ने मुझे इस बारे में बता दिया था.’ इसके साथ ही उन्होंने कहा कि प्रशासन या सरकार को इस बारे में सूचना देनी उन्होंने जरूरी नहीं समझा. उधर रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी डॉ. राघव लंगर ने कहा कि इस मामले में वन विभाग का स्पष्टीकरण तलब किया जाएगा. वैसे राघव लंगर का यह भी कहना है कि जितना बड़ी आपदा थी इसे देखते हुए 25 साल बाद भी नरकंकाल मिल सकते हैं.

पिछले साल सरकार ने केदारनाथ के लिए दो ट्रैकिंग रूट शुरू करने का ऐलान किया था. इसमें से एक रास्ता कालीमठ के पास चौरासी से होकर जाता है, जबकि दूसरा त्रियुगीनारायण से. इन ट्रैक को दुरुस्त करने का काम वन विभाग को सौंपा गया.

पच्चीस किलोमीटर लंबे त्रियुगीनारायण-केदारनाथ ट्रैक की मरम्मत का कार्य दिसंबर 2015 में शुरू किया गया, जो मई 2016 में पूरा हुआ. वन विभाग ने यह कार्य ठेके पर कराया. इन पांच महीनों में तीस से चालीस मजदूर हर रोज ट्रैक पर मौजूद रहे. इतना ही नहीं वन विभाग के अधिकारी कार्य के निरीक्षण के लिए समय-समय पर ट्रैक पर जाते रहे. इसके बावजूद प्रशासन को जानकारी नहीं दी गई.

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हद तो तब हो गई जब इसी महीने आठ अक्टूबर को ट्रैकर्स ने नरकंकाल देखे जाने की सूचना मुख्यमंत्री हरीश रावत को दी और उनके निर्देश पर एक दल रूट पर वास्तविकता का पता लगाने गया. तब भी वन विभाग के अफसरों ने अपने मुंह पर ताला जड़े रखा. नरकंकालों का पता लगाने वाले ग्रामीणों के दल में शामिल सत्येंद्र सिंह तो यहां तक आरोप लगाते हैं कि वन विभाग ने नरकंकालों के ऊपर से ही ट्रैक का निर्माण कर डाला है.

केदारनाथ वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी नीतू लक्ष्मी एम ने बताया कि नर कंकाल के बारे में जानकारी पहले से ही थी. पैदल मार्ग बनाते समय ये कंकाल अधिकारियों को दिखे थे. एसडीओ ने इसकी जानकारी मुझे दी. प्रशासन या सरकार को यह सूचना देना जरूरी नहीं समझा गया.

रुद्रप्रयाग के डीएम डॉ. राघव लंगर का कहना है कि वन विभाग को यदि नर कंकाल के बारे में जानकारी थी, तो उन्हें तत्काल सूचना देनी चाहिए थी. इस मामले में विभाग से स्पष्टीकरण लिया जाएगा.