चंपावत : झूमा देवी की कृपा से नि:संतान दंपत्तियों की सूनी गोद भर जाती है

उत्तराखंड दुनियाभर में देवभूमी के तौर पर अपनी पहचान रखता है. यहां कण-कण में भगवान का वास माना जाता है. लेकिन नेपाल सीमा से लगा चंपावत जिले का झूमा देवी का मंदिर नि:संतान दंपतियों को संतान का सुख देने के लिए जाना जाता है.

मां झूमा देवी की आस्था ऐसी है कि हजारों की संख्या में महिलाएं संतान की प्राप्ति के लिए रातभर मां का जागरण करती हैं. मान्यता है कि रातभर मां झूमा की प्रार्थना से सपने में आकर मां झूमा दर्शन देती हैं. स्वपन में ही संतान प्राप्ति के संकेत भी देती हैं.

मंदिर के पुजारी और स्थानीय लोगों का भी मानना है कि सदियों पहले नेपाल के एक नि:संतान दंपति को मां ने सपने में यहां मंदिर स्थापना करने को कहा, जिसके बाद उसको संतान की प्राप्ति हुई थी. नेपाली दम्पति ने नेपाल से एक शिला लाकर यहां स्थापित की थी.

पूरी रात मां झूमा देवी का जागरण कीर्तन के बाद लोग अगली सुबह मां के दो डोलों को हजारों की संख्या में खड़ी चढ़ाई पर रस्सियों के सहारे जान जोख़िम में डालकर मंदिर तक लाते हैं.

परम्परा के अनुसार रातभर मां झूमा का जागरण कर रही महिलाएं इन डोलों के नीचे से गुजरती हैं. पुरुष डोलों को रस्सियों और कंधे के सहारे मां के दरबार तक लाते हैं. यह मां की महिमा है कि खुद महिलाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि मां के जागरण और आशीष से उन्हें संतान की प्राप्ति हुई है.

चंपावत जिले में मां झूमा देवी के अलावा मां पूर्णागिरी, हिंगला देवी, रणजीती, देवीधुरा मां बाराही के मन्दिर हैं, जो भक्तों की आस्था के केंद्र हैं. वहीं मां झूमा देवी का मन्दिर नि:संतान दंपति के लिए विशेष महत्व रखता है.