मित्र पुलिस का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस की हकीकत ‘ये’ है, आप तो जानते ही हैं…

वैसे तो उत्तराखंड पुलिस किसी न किसी मामले को लेकर अक्सर सुर्खियां में रहती है. मित्र पुलिस का दावा करने वाली उत्तराखंड पुलिस लोगों के साथ मित्रता निभा रही है या दोहरा मापदंड अपना रही है, यह पुलिस शिकायत प्राधिकरण की कार्यप्रणाली से आपको समझ आ जाएगा.

पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के मकसद से साल 2008-2009 में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन किया गया. तब से लगातार पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायतें दर्ज हो रही हैं.

प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में कुल 373 मामले दर्ज हुए, जिसमें 75 शिकायतें अकेले ऊधमसिंह नगर जिले की थी. पूरे राज्य में सबसे ज्यादा शिकायतें पुलिस जवानों के खिलाफ ऊधमसिंह नगर में ही दर्ज हो रही हैं. जबकि 2015 में 440 शिकायतें दर्ज हुई, जिसमें 93 शिकायतें ऊधमसिंह नगर की थीं.

साल 2016 खत्म होने में अभी करीब तीन महीने बचे हैं और अब तक 303 मामले दर्ज हो चुके हैं. इनमें भी ऊधमसिंह नगर के 79 मामले शामिल हैं. दूसरे नंबर पर देहरादून और तीसरे नंबर पर हरिद्वार जिला है, जहां पुलिस जवानों की कार्यप्रणाली के खिलाफ मामले दर्ज हो रहे हैं. जबकि बागेश्वर, उत्तरकाशी, चमोली जैसे जिलों में सबसे कम शिकायतें दर्ज हो रही हैं.

प्राधिकरण के अध्यक्ष अजयसिंह नबियाल का कहना है कि जिन मामलों के बारे में फैसले होते हैं, उनके बारे में पीएचक्यू को चिट्ठी लिखी जाती है, वही राम सिंह मीणा, एडीजी प्रशासन का कहना है कि प्राधिकरण के मामलों की जांच होती है. फिर कार्रवाई भी की जाती है, जबकि शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्हें इंसाफ के लिए साल भर भटकना पड़ता है.

दरअसल प्राधिकरण के लिए सरकार हर साल 1 करोड़ 20 लाख रुपये से अधिक खर्च कर रही है. रिकॉर्ड के मुताबिक एक मामले के निदान में प्राधिकरण के करीब 32 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं. वही प्राधिकरण जब पुलिस जवानों के खिलाफ फैसला सुनाता है, तो कार्रवाई के लिए पीएचक्यू को चिट्ठी भेजी जाती है. फिर पीएचक्यू स्तर से मामले की जांच होती है या तो पुलिस जवान बच जाते हैं या फिर कोर्ट की शरण लेते हैं.

साल 2016 में कुल 17 पुलिस जवानों के खिलाफ प्राधिकरण ने फैसला सुनाया है. मगर 4 पुलिसकर्मियों के खिलाफ ही अभी तक कार्रवाई हुई है. बाकी मामले लंबित हैं. वही शिकायतकर्ताओं का कहना है कि तारीख पर-तारीख लगती रहती है. इंसाफ के लिए वे सालभर भटकते रहते हैं.