हिमालय के नीचे ‘लॉस्ट सिटी’ की खोज में जुटे वैज्ञानिक | जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण आदि पर रिसर्च

दुनियाभर के तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि आज जिस जगह पर हिमालय पर्वत खड़ा है वहां कभी विशाल समुद्र था. इसी हिमालय के गर्भ में समुद्र के साथ समाए जलीय जंतुओं के संसार की खोजबीन में सारी दुनिया के विज्ञानिक जुट गए हैं.

हिमालयी क्षेत्र में तेजी से आ रहे बदलाव को समझने के लिए विज्ञानिक बीते दिनों के रहस्यों से पर्दा उठाना चाहते हैं, जिससे आने वाले दिनों के संबंध में कुछ अंदाज लग सके. हिमालयी ‘सब डक्शन जोन’ में जीव-जंतुओं के जीवाश्मों को तलाशा जा रहा है.

इसकी जांच करके पता लगाया जा रहा है कि जब समुद्र भूगर्भ में समाया था तो स्थिति क्या रही होगी? समुद्र के जलीय संसार में किन जीवों का दबादबा रहा और उस वक्त ऑक्सीजन का लेवल क्या था? वैसे तो इस वक्त अमेरिकी, जर्मनी, इटली, फ्रांस आदि देशों के विज्ञानिकों ने हिमालयी ‘सब डक्शन जोन’ में डेरा डाल रखा है.

हर देश के विज्ञानिक गोपनीय तरीके से यहां शोध कर रहे हैं. करोड़ों साल पुराने जीवाश्मों के जो साक्ष्य मिल रहे हैं, उनकी जांच अपने अंदाज से की जा रही है. भारतीय विज्ञानिकों ने इसका नाम ‘लॉस्ट सिटी’ दिया है. ‘लॉस्ट सिटी’ में वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानिक डॉ. वरुण कुमार मुखर्जी सहित अन्य विज्ञानिक भी जुटे हुए हैं.

बताया जाता है कि करीब पांच करोड़ साल पहले जब इंडियन प्लेट यूरेशियन प्लेट के नीचे धंसनी शुरू हुई तो जगह पाकर यहां समुद्र भूगर्भ में समा गया.

इसके साथ ही यहां का समृद्ध समुद्री जलीय संसार भी खत्म हो गया. यहां जो जलीय जंतु रहे हैं उनके जीवाश्म प्रकृति ने इस क्षेत्र में सुरक्षित रखे हुए हैं. विज्ञानिकों का मानना है कि इनकी जांच से पहले जलवायु परिवर्तन के संबंध में पता चलेगा. इस दौरान यहां ज्वालामुखी बड़ी संख्या में फटे होंगे.

जीवाश्म के रूप में जो साक्ष्य मिले हैं, उनसे माना जा रहा है कि ज्वालामुखी के प्रभाव के कारण यहां का पानी अलकेलाइन हो गया. पानी में एसिड की मात्रा बढ़ गई होगी, जिससे ऑक्सीजन लेवल नीचे आया और जंतुओं का जी पाना मुश्किल हो गया. इससे पुरातन काल के पर्यावरण और चट्टानों के प्रकार के संबंध में भी जानकारी जुटाई जा रही है.

‘लॉस्ट सिटी’ के संबंध में जानकारी जुटाने के लिए विदेशी विज्ञानी भी गोपनीय तरीके से काम कर रहे हैं. यहां मिलने वाले साक्ष्यों से उस वक्त के जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और जलीय संसार की विविधता के संबंध में भी जानकारी मिलेगी, जो साक्ष्य मिल रहे हैं उनकी जांच की जा रही है.