उत्तराखंड की झीलों-तलाबों में होगा बेशकीमती मोती का उत्पादन, यहां जानें कैसे

बेशकीमती मोती बनाने वाले सीप अब तक दुनिया में केवल पारस की खाड़ी और हिंद महासागर पर मिलते थे. लेकिन जापान ने मोती पर रिसर्च करके इसे आर्टिफिशियल तरीके से बनाने के तकनीक इजाद कर ली थी. अभी तक यह तकनीक केवल जापान के पास थी. इसके बाद भारत ने वैज्ञानिक अजय कुमार सोनकर का प्रयास सफल हुआ और उन्होंने भी मोती बनाने के तरीका इजाद कर लिया.

मोती बनाने की जापानी तकनीक में हजारों सीप की मौत हो जाती थी. लेकिन अजय सोनकर की मोती बनाने की तकनीक में सीप की मौत नहीं होती, बल्कि एक सीप अपने जीवन में कई बार मोती बना सकता है. अब अजय कुमार सोनकर उत्तराखंड में मोतियों की खेती करने वाले हैं. वह यहां के तालाब और झीलों में अपनी तकनीक से मोतियों का उत्पादन करेंगे.

पुराने जमाने में मोती सम्राट के पास होते थे. करीब दस हजार साल पहले दक्षिणी तट पर भारत के शिक‌ारियों द्वारा मोती की खोज हुई थी. जहाजी इन मोतियों के बदले सोने से भरे जहाज दे जाते थे. वैज्ञानिक अजय कुमार सोनकर ने अंडमान के वर्जिन समुद्र में पाई जाने वाली सीप की ऐसी प्रजाति में मोती बनाने की तकनीक इजाद की, जिसमें दुनिया का बहुमूल्य मोती माना गया है.

अजय की इस तकनीक से भारत का नाम बहुमूल्य मोती बनाने वाले देशों में शुमार हुआ है. सोनकर ने दुनिया का सबसे बड़ा काला मोती बनाने में सफलता पाई है. इससे पहले दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक को ऐसा करने में सफलता नहीं मिली थी.

सोनकर कि इस तकनीक के व्यवसायीकरण से भारत मोती निर्यात के क्षेत्र में काफी आगे जा चुका है. मोती के विश्व बाजार में जापानियों का दबदबा है, जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया और चीन का स्थान आता है. हैदराबाद सहित देश के अधिकतर भागों में बिकने वाले मोती चीन के मीठे पानी में बने मोती हैं. इस मोती में ‘पर्ली तत्व’ महज 5 प्रतिशत हैं, इसलिए समय के साथ इसकी चमक चली जाती है.

मोती उत्पादन के लिए सबसे अहम तत्व उसका न्यूक्लियस होता है, जिसे बनाने की जानकारी जापानी पर्ल एक्वाकल्चर वैज्ञानिकों तक ही सीमित थी और इसी कारण से विश्वभर में मोती उत्पादन के मामले में जापान का एकाधिकार कायम है. इसी न्यूक्लियस को सर्जरी के जरिये सीप के शरीर में प्रवेश कराया जाता है जिस पर सीप पर्ली तत्व की महीन परतों की लेप लगाता हुआ अंत में इसे जैविक रत्न मोती में तब्दील कर देता है.

सोनकर ने न्यूक्लियस बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित कर पर्ल कल्चर के क्षेत्र में जापान के एकाधिकार को चुनौती दी है. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी अगस्त, 2004 में उनके न्यूक्लियस संबंधी शोध की सराहना की थी.

सोनकर ने बताया कि उन्हें कई निगमित कंपनियों की ओर से इस तकनीक के व्यवसायीकरण का प्रस्ताव मिला, मगर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि ये कंपनियां उनके भावी रिसर्च को भी अपने अधिकार में रखने की शर्त थोप रही थीं.

उल्लेखनीय है कि सोनकर ने 22 मिलीमीटर आकार का न्यूक्लियस बनाकर जापान का रिकॉर्ड तोड़ा था, जिसने 18 मिलीमीटर आकार का न्यूक्लियस बनाया था. उल्लेखनीय है कि जितना बड़ा न्यूक्लियस होगा, मोती उतना ही बड़ा होगा और उसकी कीमत में उसी हिसाब से बढ़ेगी.