मुजफ्फरनगर कांड की बरसी : जब उत्तराखंड आंदोलनकारियों पर भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़ी थी यूपी पुलिस

मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुजफ्फरनगर कांड की बरसी की पूर्व संध्या पर उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले अमर शहीदों को अस्थायी राजधानी देहरादून में श्रद्धासुमन अर्पित किए. उन्होंने कहा कि इन शहीदों की कुर्बानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता है.

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य को देश का आदर्श राज्य बनाने के लिए हमें एकजुट होकर कार्य करना होगा, जिससे राज्य आन्दोलन के शहीदों के सपनों के अनुरूप चहुंमुखी विकास किया जा सके. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार शहीदों के आश्रितों एवं राज्य आन्दोलनकारियों के कल्याण के लिए वचनबद्ध है.

क्या है मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) गोली कांड

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एक अक्टूबर, 1994 को दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना देने के लिए उत्तराखंड से करीब दो सौ बसों में सवार महिला, पुरुष राज्य आंदोलनकारियों ने मार्च किया. उस समय समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह संयुक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे.

‘आज दो, अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो’ जैसे गगनभेदी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे सभी आंदोलनकारियों को पुलिस ने मुजफ्फरनगर के नारसन रामपुर तिराहे पर रोक दिया. आंदोलनकारियों को बसों से बाहर निकालकर उन पर अंधाधुंध लाठियां बरसाई गई. पुलिस और प्रशासन की बर्बरता यहीं नहीं रुकी और महिला आंदोलनकारियों के साथ गैंगरेप भी किया गया.

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मुजफ्फरनगर में हुए उस दिल दहला देने वाले कांड को उत्तराखंड के लोग आज भी नहीं भुला पाए हैं. इस कांड में पीड़ित आंदोलनकारियों को आज भी इंसाफ नहीं मिला है. सन् 1994 में जब मुजफ्फरनगर में यह दिल दहला देने वाला कांड हुआ था, उसके आसपास पैदा हुई एक पूरी पीढ़ी है जो अब 20 से 24 साल तक की हो गई है और वोटर के रूप में राजनीति में भी हिस्सेदारी करने लगी है. उसने अपने माता-पिता से इस घटना के बारे में सुना भी होगा. शायद नई पीढ़ी ने वह फांस महसूस नहीं की होगी, जो पुराने गठिया वात की तरह इससे पहले की पीढ़ी को आज भी लगातार सर्प दंश की तरह चुभता है.

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उत्तराखंड और विशेषकर कुमाऊं के प्रसिद्ध कवि गिरीश चंद्र तिवारी यानी गिरदा तो मरते-मरते तक ‘खटीमा मसूरी मुजफ्फर रंगै गे जो…..’ गाने का कोई मौका नहीं चूकते थे. अब उस दौर के आंदोलनकारियों के लिए भी 1 सितंबर (खटीमा गोली कांड) या 2 सितम्बर (मसूरी गोली कांड) या 2 अक्टूबर (मुजफ्फरनगर कांड) को शहीदों को याद करना एक उबाऊ सा कर्मकांड बनकर रह गया है.

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एक समय था जब तमाम लोग यही कहते थे कि यदि मुजफ्फरनगर कांड के अपराधियों को सजा नहीं मिली तो उत्तराखंड राज्य बनने का भी कोई अर्थ नहीं है. मुजफ्फरनगर कांड हमारे भीतर गुस्सा भरता था तो हमें कुछ करने को प्रेरित भी करता था.