आज है नवरात्र का पहला दिन | माँ शैलपुत्री के इन मंत्रों से मिलती है परम सिद्धि

नवरात्रि के नौं दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना, आराधना व उपासना की जाती है और प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप की उपासना का प्रावधान है। नवरात्रि के पहले तीन तीन मां पार्वती, अगले तीन दिन माता लक्ष्मी व नवरात्रि के अन्तिम तीन दिन माता सरस्वती के लिए समर्पित हैं, जबकि प्रत्येक दिन माता दुर्गा के किसी एक अलग रूप की उपासना होती है, जिनका वर्णन निम्नानुसार है-

दुर्गा-पूजा के पहले दिन माँ शैलपुत्री की उपासना का विधान है दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है. नवरात्र पूजन के प्रथम दिन मां शैलपुत्री जी का पूजन होता है. माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है,
शारदीय नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है. विधि- विधान के अनुसार इस स्थान पर अक्षत डाले जाते हैं तथा कुमकुम मिलाकर डाला जाता है तत्पश्चात इस पर कलश स्थापित किया जाता है.

मंत्र :वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।
भगवती माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं ! पर्वतराज हिमालय के यहाँ पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका शैलपुत्री नाम पड़ा था! वृषभ – स्थिता इन माता जी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित हैं ! यही नव दुर्गों में प्रथम दुर्गा हैं ! अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी !

तब इनका नाम ‘सती’ था ! इनका विवाह भगवन शंकर जी से हुआ था! एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विसाल यज्ञ का आयोजन किया ! इस यज्ञ में उन्होंने सारे देवी देवताओं को अपना -२ यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया ! किन्तु शंकर जी को उन्होंने इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया ! सती ने जब ये सुना की उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं , तब वहां जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा ! पानी यह इक्षा उन्होंने शंकर जी को बताई ! सारी बातो पर विचार करने के बाद शंकर जी ने कहा – प्रजापति दक्ष किसी कारण वश हमसे नाराज हैं !

अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवी देवताओं को आमंत्रित किया हैं! उनके यज्ञ भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं , किन्तु हमे जान बूझ कर नहीं बुलाया हैं ! कोई सूचना तक नहीं भेजी हैं ! ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा ! शंकर जी के इस कथन से भी सती को प्रबोध नहीं हुआ पिता का यज्ञ देखने , वहां जाकर माता और बहनों से मिलने की व्याकुलता किसी प्रकार भी कम न हो सकी ! उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान् शंकर जी ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी ! सती ने पिता के घर पहुँच कर देखा की कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा ! केवल उनकी माँ ने स्नेह से उन्हें गले लगाया ! परिजनों के इस व्यवहार से उन्हें बहुत दुःख पंहुचा ! प्रजापति दक्ष ने भगवान् शंकर के प्रति अपमानजनक वचन भी कहे तथा भगवान् शंकर जी के लिए उनके ह्रदय में तिरस्कार का भाव भी भरा था!

यह सब देखकर सती का ह्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा ! उन्होंने सोचा भगवान् शंकर जी की बात न मान यहाँ आकर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की हैं ! वह अपने पति भगवान् शंकर के इस अपमान को सहन न कर सकी ! उन्होंने अपने इस रूप को तत्क्षर वहीँ यागाग्नी में जला कर भस्म कर दिया ! वज्रपात के समान इस दारुण – दुखद घटना को सुनकर भगवान् शंकर ने क्रुद्ध होकर अपने गणों को भेज कर दक्ष के यज्ञ को पूर्णतया विध्वंश करा दिया ! सती ने योगाग्नी द्वारा शरीर को भष्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया ! इस बार वह ‘शैलपुत्री ‘ नाम से विख्यात हुई !
पार्वती तथा हेमवती भी उन्ही के नाम हैं ! ‘ शैलपुत्री ‘ देवी का विवाह भी भगवान् शंकर जी से हुआ ! नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत हैं ! नवरात्री पूजन में प्रथम दिवस में इन्ही की पूजा और उपासना की जाती हैं ! माता शैलपुत्री को नमन

कलश स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं
• मिट्टी का पात्र
• जौ
• शुद्ध साफ की हुई मिट्टी
• शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चाँदी, तांबा, पीतल, या मिट्टी का कलश
• रछासूत्र
• कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के
• अशोक या आम के पांच पत्र
• कलश को ढकने के लिए मिट्टी का पात्र अर्थात ढक्कन
• साबुत चावल
• एक पानी वाला नारियल
• लाल कपड़ा या चुनरी
• लाल फूलो की माला साथ ही कुछ फूल

नवरात्र कलश स्थापना की विधि:
भविष्य पुराण के अनुसार कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को शुद्ध कर लेना चाहिए। एक लकड़ी का फट्टा रखकर उसपर लाल रंग का कपड़ा बिछाना चाहिए। इस कपड़े पर थोड़ा- थोड़ा चावल रखना चाहिए। चावल रखते हुए सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करना चाहिए। एक मिट्टी के पात्र (छोटा समतल गमला) में जौ बोना चाहिए। इस पात्र पर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करना चाहिए। कलश पर रोली से स्वस्तिक या ऊं बनाना चाहिए।

कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए। कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिए। कलश के मुख को ढक्कन से ढंक देना चाहिए। ढक्कन पर चावल भर देना चाहिए। एक नारियल ले उस पर चुनरी लपेटकर रक्षा सूत्र से बांध देना चाहिए। इस नारियल को कलश के ढक्कन पर रखते हुए सभी देवताओं का आवाहन करना चाहिए। अंत में दीप जलाकर कलश की पूजा करनी चाहिए। कलश पर फूल और मिठाइयां चढ़ाना चाहिए।

नोटः नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता है वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

माँ शैलपुत्री का मंत्र : माँ शैलपुत्री की पूजा इस मंत्र के उच्चारण से की जानी चाहिए-

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
वर्ष 2016 में पूजा का दिन:
आश्विन शारदीय नवरात्र में माता की पूजा 01 अक्टूबर और 02 अक्टूबर को की जाएगी।

पूजा में उपयोगी वस्तु : मां भगवती की विशेष कृपा प्राप्ति हेतु सभी तरीकों से माता की पूजा के बाद नियमानुसार प्रतिपदा तिथि को नैवेद्य के रूप में गाय का घी मां को अर्पित करना चाहिए और फिर वह घी ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

पूजा फल : मान्यता है कि माता शैलपुत्री की भक्तिपूर्वक पूजा करने से मनुष्य कभी रोगी नहीं होता।

शर्दिय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं .अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों,दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है. कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है इसे जयन्ती ( कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है

“जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”.

इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’. देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं.

शैलपुत्री की ध्यान :
वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥
शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ :
प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

शैलपुत्री की कवच :
ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं
ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ओम् शैलपुत्री देव्यै नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मनोकामना गुटिका एवं मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें। तत्पश्चात् मनोकामना गुटिका का पंचोपचार द्वारा पूजन करें। दीप प्रज्जवलित करके ही पूजन करें। यदि संभव हो तो नौ दिनों तक अखण्ड ज्योति जलाने का विशेष महत्व होता है। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। संख्या 108 होनी चाहिए। मंत्र -ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मंत्र संख्या पूर्ण होने के बाद मां के चरणों में अपनी मनोकामना को व्यक्त करके मां से प्रार्थना करें तथा श्रद्धा से आरती कीर्तन करें।