पुण्यतिथि पर बहुत याद आए पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली

पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की शनिवार को समूचे उत्तराखंड में धूमधाम से मनाई गई. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी पौड़ी जिले के पीठसैंण में पेशावर कांड के नायक और स्वाधीनता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की प्रतिमा का अनावरण किया. वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के परिवार वालों को भी रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सम्मानित किया.

इस मौके पर उत्तराखंड के राजनीतिक दल अपने-अपने ढंग से इस महान स्वाधीनता सेनानी याद कर रहे हैं. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गैरसैंण में बनने वाले विधानसभा भवन का नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर रखने की घोषणा की है. आजादी के ऐसे वीर नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की शख्सियत और उनके योगदान को याद करना जरूरी हो जाता है. यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हमारी आज की पीढ़ी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जैसे स्वतंत्रता सैनानियों को भूलती जा रही है.

ब्रिटिश हुकूमत के दांत खट्टे करने वाले देवभूमि उत्तराखंड के वीर सपूत वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी पहाड़ की आबो हवा में हमेशा गूंजती रहेगी. महात्मा गांधी ने भी कहा था, ‘मुझे एक चन्द्र सिंह गढ़वाली और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता.’ 23 अप्रैल, 1930 को अफगानिस्तान के निहत्थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर गोली चलाने से इनकार करने वाले चन्द्र सिंह गढ़वाली ने उसी समय ये अहसास करा दिया था कि ब्रिटिश हुकूमत के अब ज्यादा दिन शेष नहीं बचे हैं.

वीर भूमि उत्तराखंड में वीरों की कमी नहीं है. लेकिन वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने अंग्रेजों के आदेश को न मानते हुए अपने ही लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर एक नई क्रांति को जन्म दिया था. चन्द्र सिंह कभी अपने बुलंद इरादों की वजह से ही किसी के आगे नहीं झुके, भले ही स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें सलाखों के पीछे ही क्यों न जाना पड़ा हो.

महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की कहानी
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जंग-ए-आजादी के इस महानायक का जन्म पौड़ी जिले के थलीसैंण ब्लॉक के मासी, रौणीसेरा में 25 दिसम्बर 1891 को हुआ था. शुरू से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा पाले वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली 11 सितम्बर 1914 को गढ़वाल राइफल में भर्ती हुए.

पहले विश्व युद्ध में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने साथियों के साथ यूरोप और मध्य पूर्व क्षेत्र में हुई लड़ाई में भाग लिया था. 1930 में वीर चन्द्र गढ़वाली की बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म मिला.

पेशावर के किस्साखानी बाजार में 23 अप्रैल 1930 को जब खान अब्दुल गफ्फार खान अपने साथियों के साथ एक आम सभा कर रहे थे, तो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली और उनकी 72 गढ़वाली सैनिकों की एक टुकड़ी को अग्रेजों ने गोलियां चलाने का आदेश दिया, लेकिन कैप्टेन रिकेट के आदेश को दरकिनार करते हुए वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने गढ़वाली सैनिकों को सीज फायर का आदेश देकर अंग्रेजों के खिलाफ पहले सैनिक विद्रोह का विगुल फूंक दिया.

अग्रेंजों के आदेश को न मानने वाले गढ़वाली सैनिकों को पेशावर में ही नजरबंद कर दिया गया और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, जबकि हवलदार 253 वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को मृत्युदण्ड की जगह आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. करीब 15 साल बाद 1945 में जब वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जेल से रिहा हुए तो उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर आजादी के अनेक आंदोलनों में हिस्सा लिया.

स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के बाद भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली चुप नहीं बैठे और समाज की कुरीतियों के खिलाफ वह सड़कों पर अकेले ही लड़ते रहे। पृथक राज्य उत्तराखंड़ के लिए भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली हमेशा लड़ते रहे और पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में ही बनाने की पैरवी करते रहे.

जंग-ए-आजादी का यह महानायक आम आदमी के अधिकारों की लड़ाई लड़ते-लड़ते 1 अक्टूबर 1979 को हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कर गया था.