सर्जिकल स्ट्राइक के पीछे है भारत के जेम्स बांड का दिमाग, उत्तराखंड के इस सपूत के बारे में यहां जानें

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सफल सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने में जितनी भूमिका सेना के जवानों की है उतनी ही अहम भूमिका एनएसए अजित डोवाल की भी है. अजित डोवाल की सटीक रणनीति ने भारत के साथ-साथ देवभूमि उत्तराखंड का सीना भी 56 इंच का कर गौरवान्वित किया है.

जिस सर्जिकल स्ट्राइक पर पूरा देश जश्न मना रहा है, उसका ताना-बाना बुनने से लेकर ऑपरेशन को अंजाम देने में अजित डोवाल की अहम भूमिका रही. डोवाल ने उत्तराखंड वासियों के सीने को गर्व से चौड़ा कर दिया.

बता दें कि सीमापार पीओके में चल रहे आतंकी कैम्पों से जुड़े सर्जिकल स्ट्राइक में सबसे बड़े थिंक टैंक माने जा रहे डोवाल मूलरूप से उत्तराखंड के रहने वाले हैं. पौड़ी गढ़वाल के गांव घिड़ी बैन्येलस्यूंण में 20 जनवरी 1945 को जन्मे अजित डोवाल पर आज पूरे देश को गर्व है. सर्जिकल स्ट्राइक की खबर मिलने के बाद से ही पौड़ी जिले के घिड़ी गांव में जश्न का माहौल है.

डोवाल के पिता भी भारतीय सेना में सेवाएं दे चुके हैं, लिहाजा देशभक्ति का जज्बा उनके भीतर पहले से ही कूट-कूट कर भरा है. उनकी शुरुआती शिक्षा राजस्थान के अजमेर मिलिट्री स्कूल में हुई और फिर 1967 में आगरा से स्नातक की डिग्री हासिल की. सीमापार चल रहे आतंकी कैम्प धवस्त करने के मंसूबे को एक बड़ी रणनीति के तहत अंजाम दिया गया.

इस ऑपरेशन में अजित डोवाल ने अहम भूमिका निभाई. इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए अपने अमेरिकी समकक्ष को भी डोवाल ने विश्वास में लिया और दुनिया के तमाम देशों को भारत के पक्ष में खड़ा करने की रणनीति पर भी काम किया गया.

दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की नजर निगहबानी के साथ निशाना साधने में भी अचूक है. अजित डोवाल 1968 में केरल कैडर के आईपीएस बनने के बाद मिजोरम और पंजाब में कई विशेष ऑपरेशन्स के अगुवा बने. कंधार विमान हाईजैक मामले में भी डोवाल ने ही आईसी-814 के यात्रियों को आतंकियों से छुड़ाने में मध्यस्थता की थी.

1988 में अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान खुफिया जानकारी जुटाने में अजित डोवाल ने अहम भूमिका निभाई थी. पीओके में मौजूदा सर्किल स्ट्राइक को ऐसे ही तैश में आकर अंजाम नहीं दिया गया. अजित को पाकिस्तान में काम करने का छह साल का लम्बा अनुभव है, लिहाजा पाक की नापाक़ हरकतों से वे बखूबी वाकिफ़ हैं.

जनवरी 2005 में आईबी के डायरेक्टर पद से रिटायर होने के बाद उन्होंने विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की नींव रखी और समाजसेवा में जुड़ गए, लेकिन इस दौरान देश की सुरक्षा चुनौतियों और विदेश नीति के मसले पर सम्पादकीय भी लिखते रहे. मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री अकादमी में प्रशासनिक सेवा के अफसरों को बारीकियां सिखाईं तो कई अन्य संस्थानों में अपने अनुभव साझा किए.

30 मई 2014 को अजित डोवाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद पर नियुक्त किया गया और फिर डोवाल अपने अंदाज में काम करने लगे. इराक में 46 भारतीय नर्सों की सकुशल वापसी में डोवाल ने अपना अहम रोल निभाया. आईएसआईएस के कब्जे से नर्सों को मुक्त कराने के लिए डोवाल खुद वहां गए और भारतीय नर्सों की वापसी हो गई. म्यांमार ऑपरेशन भी अजित डोवाल की कुशल रणनीति के तहत अंजाम दिया गया था.

सर्विस के समय अजित डोवाल पुलिस पदक पाने वाले सबसे युवा अधिकारी बने तो राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी उन्हें नवाजा गया. 1988 में कीर्ति चक्र पाने वाले पहले पुलिस अफसर बने, क्योंकि इससे पहले यह बड़ा सम्मान सिर्फ सेना में ही दिया जाता था.

पीओके में चल रहे आतंकी ठिकानों पर हमला करने और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल चर्चा में हैं. पूरा देश गौरवान्वित है तो साथ ही देवभूमि उत्तराखंड का सीना भी 56 इंच का हो गया है.