गणेश चतुर्थी विशेष : जानें पूजन का मुहूर्त, महत्व और कैसे होगी मनोकामना पूर्ति

गणेश चतुर्थी की तैयारी पूरे देश में जोर-शोर से चल रही है. इस साल 5 सितंबर को इस पर्व को मनाया जाएगा. बुद्धि और ज्ञान के देवता भगवान गणेश की पूजा का यह सबसे बड़ा दिन माना जाता है.

अगर इस दिन की पूजा सही समय और मुहूर्त पर की जाए तो हर मनोकामना की पूर्ति होता है. ऐसा माना जाता है कि गणपति जी का जन्म मध्यकाल में हुआ था, इसलिए उनकी स्थापना इसी काल में होनी चाहिए.

गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त…
मध्याह्न गणेश पूजा का समय = 11:04 से 13:34
अवधि = 2 घंटे 29 मिनट्स

4 सितंबर को चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = 18:54 से 20:30
अवधि = 1 घंटा 35 मिनट्स

5 सितंबर को चन्द्रमा को नहीं देखने का समय = 09:16 से 21:05
अवधि = 11 घंटे 48 मिनट्स

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = 4/सितम्बर/2016 को 18:54 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त = 5/सितम्बर/2016 को 21:09 बजे

गणेश चतुर्थी के दिन का पञ्चाङ्ग
गणेश चतुर्थी के दिन का चौघड़िया मुहूर्त

टिप्पणी –
24 घंटे की घड़ी नई दिल्ली के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है).

2016 गणेश चतुर्थी
भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है. यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था. अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार गणेश चतुर्थी का दिन अगस्त अथवा सितम्बर के महीने में आता है.

गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, 10 दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से जाना जाता है. अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं.

गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्त
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था, इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जाता है. हिन्दू दिन के विभाजन के अनुसार मध्याह्न काल, अंग्रेजी समय के अनुसार दोपहर के तुल्य होता है.

हिन्दू समय गणना के आधार पर, सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य के समय को पांच बराबर भागों में विभाजित किया जाता है. इन पांच भागों को क्रमशः प्रातःकाल, सङ्गव, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल के नाम से जाना जाता है. गणेश चतुर्थी के दिन, गणेश स्थापना और गणेश पूजा, मध्याह्न के दौरान की जानी चाहिए. वैदिक ज्योतिष के अनुसार मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है.

मध्याह्न मुहूर्त में, भक्त-लोग पूरे विधि-विधान से गणेश पूजा करते हैं जिसे षोडशोपचार गणपति पूजा के नाम से जाना जाता है.

कैसे करें पूजा…
इस महापर्व पर लोग प्रातः काल उठकर सोने, चांदी, तांबे और मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं पूजन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं. मान्यता के अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नही देखना चाहिए.

इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है.

गणेश चतुर्थी पर निषिद्ध चन्द्र-दर्शन
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है, जिसकी वजह से दर्शनार्थी को चोरी का झूठा आरोप सहना पड़ता है.

पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था. झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख कर, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था, जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है.

नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जाएगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जाएगा. नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिए गणेश चतुर्थी के व्रत को किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गए.

मिथ्या दोष निवारण मन्त्र
चतुर्थी तिथि के प्रारम्भ और अन्त समय के आधार पर चन्द्र-दर्शन लगातार दो दिनों के लिए वर्जित हो सकता है. धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र दर्शन निषेध होता है और इसी नियम के अनुसार, चतुर्थी तिथि के चन्द्रास्त के पूर्व समाप्त होने के बाद भी, चतुर्थी तिथि में उदय हुए चन्द्रमा के दर्शन चन्द्रास्त तक वर्ज्य होते हैं.

अगर भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जाएं, तो मिथ्या दोष से बचाव के लिए निम्नलिखित मन्त्र का जाप करना चाहिए –

सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है.

मनोकामना सिद्धि के लिए यह 8 प्रयोग आजमाए जा सकते हैं.

आदि देवता शिवपुत्र श्री गणेशजी का प्राकट्य भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को हुआ था. इस वर्ष सोमवार, 5 सितंबर 2016 को चतुर्थी मानी गई है. विघ्नहर्ता, बुद्धि प्रदाता, लक्ष्मी प्रदाता गणेश को प्रसन्न करने का इससे अच्छा समय दूसरा नहीं है.

(1) श्वेतार्क- गणेश को पूर्वाभिमुख हो रक्त वस्त्र आसन प्रदान कर यथाशक्ति पंचोपचार या षोडषोपचार पूजन कर लड्डू या मोदक का नेवैद्य लगाकर ‘ॐ गं गणपतये नम:’ की 21, 51 या 108 माला कर उपलब्ध साधनों से या केवल घी से 1 माला आहुति दें।

(2) विवाह कार्य या पारिवारिक समस्या के लिए उपरोक्त तरीके से पूजन कर ‘ॐ वक्रतुंडाय हुं’ का प्रयोग करें. माला मूंगे की हो.

(3) आकर्षक वशीकरण के लिए लाल हकीक की माला का प्रयोग करें.

(4) विघ्नों को दूर करने के लिए श्वेतार्क गणपति पर ‘ॐ गं ग्लौं गणपतये विघ्न विनाशिने स्वाहा’ की 21 माला जपें.

(5) शत्रु नाश हेतु नीम की जड़ के गणपति के सामने ‘हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा’ का जप करें. लाल चंदन, लाल रंग के पुष्प चढ़ाएं. पूजनादि कर मध्य पात्र में स्थापित कर दें तथा नित्य मंत्र जपें’ शत्रु वशी हो तथा घोर से घोर उपद्रव भी शांत हो जाते हैं.

(6) शक्ति विनायक गणपति : इनकी आराधना करने से व्यक्ति सर्वशक्तिमान होकर उभरता है. उसे जीवन में कोई कमी महसूस नहीं होती है. कुम्हार के चॉक की मिट्टी से अंगूठे के बराबर मूर्ति बनाकर उपरोक्त तरीके से पूजन करें तथा 101 माला ‘ॐ ह्रीं ग्रीं ह्रीं’ की जप कर हवन करें। नित्य 11 माला करें तथा चमत्कार स्वयं देख लें.

(7) लक्ष्मी विनायक गणेश : इनका भी प्रयोग उपरोक्त तरीके से कर निम्न मंत्र जपें- ‘ॐ श्रीं गं सौम्याय गणपतये वरवरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा.’ 444 तर्पण नित्य करने से गणेशजी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है.

8) आधुनिक युग में महत्वाकांक्षाओं के चलते मनुष्य शीघ्र ही कर्ज के जाल में फंस जाता है. लाख कोशिश करने पर भी उससे निकल नहीं पाता. दैवकृपा ही इस कष्ट से मुक्ति दिला सकती है. निम्न मंत्र की 108 माला गणेश चतुर्थी पर कर यथाशक्ति हवन कर नित्य 1 माला करें, शीघ्र ही इस जंजाल से मुक्ति मिलेगी.

‘ॐ गं लक्ष्म्यौ आगच्छ आगच्छ फट्’