पिथौरागढ़ में दो महीने के लिए धारा 144, कारण- प्रशासनिक खोखलापन और हैरानी दोनों बढ़ाएंगे

कांग्रेस-बीजेपी की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीमांत जिले पिथौरागढ़ के लोगों पर भारी पड़ रही है. आलम यह है राज्य बनने के बाद यहां लोगों को पहली बार धारा 144 का सामना करना पड़ रहा है. जिस कारण जहां आम लोगों की जरूरी आवाज दब रही है, वहीं जिले में अघोषित आपातकाल जैसे हालात भी नजर आ रहे हैं.

राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है, जब पिथौरागढ़ जिले को 60 दिनों तक धारा 144 का सामना करना पड़ेगा. कानून व्यवस्था के चलते हालांकि प्रशासन ने कुछ मौकों पर पहले भी इस हथियार का इस्तेमाल किया था, लेकिन तब हालात कुछ और थे. फिलहाल जिला प्रशासन ने जिले की सभी तहसीलों में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार धारा 144 लगाई हुई है.

ऐसा भी शायद ही देखने को मिला है कि मात्र राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के चलते लोगों को आपातकाल जैसे हालात झेलने पड़े हों. जिलाधिकारी मोहम्मद नासिर ने बताया कि फिलहाल सभी तहसीलों में 60 दिनों के लिए धारा 144 लगाई गई है.

बिना किसी ठोस के कारण लगाई गई धारा 144 के चलते राजनीतिक माहौल भी गर्माया हुआ है. बीजेपी इसे विपक्ष के अधिकारों पर हमला तो बता रही है. लेकिन इसके खिलाफ जमीनी संघर्ष में वह कहीं भी नजर नहीं आ रही है. जिस कारण सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पर सवाल उठ रहे हैं. भाकपा (माले) के जिला प्रभारी गोविंद कफलिया का कहना है कि शांत माहौल में धारा 144 लगाए जाने का कोई औचित्य ही नही ठहरता. लेकिन हैरानी इस बात की भी है कि मुख्य विपक्षी बीजेपी ने चुप्पी साधी हुई है.

कहा जा रहा है कि बीजेपी नेता हरक सिंह रावत की पर्दाफाश रैली को देखते हुए धारा 144 लगाई गई है. हरक सिंह 21 अगस्त को मुख्यमंत्री हरीश रावत की विधानसभा धारचूला से इस रैली का आगाज करने वाले हैं. यही नहीं कांग्रेसियों ने भी इस रैली को विफल बनाने के लिए व्यापक विरोध का ऐलान किया है. लेकिन फिर भी यह सवाल उठना लाजमी है कि मात्र एक रैली के लिए आखिर 60 दिनों तक धारा 144 लगाए रखने का क्या औचित्य है.