‘हजार चौरासी की मां’ के जाने से साहित्य बिरादरी में छाया शोक

लेखिका और समाज सेविका महाश्वेता देवी के निधन पर शोकाकुल लेखक समुदाय ने उन्हें ‘बहुत बड़ी रचनाकार’ बताया और कहा कि उन्होंने समाज के शोषित एवं वंचित वर्ग को बहुत करीब से महसूस करके उसे अपने रचना संसार का हिस्सा बनाया, जो इससे पहले साहित्य से अछूता रहा।

साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपने शोक संदेश में कहा, ‘महाश्वेता देवी देश की एक महत्वपूर्ण लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ती थीं। उन्होंने आदिवासियों के जीवन को बहुत गहराई से देखा और चित्रित किया।

मैंने उनके कथा साहित्य को हिंदी में पढ़ा है और मुझे दो दफा उनसे मिलने का भी अवसर मिला।’

उन्होंने कहा, ‘मैं उनके शांत और सरल व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित रहा हूं। शब्द और कर्म दोनों ही स्तरों पर सक्रिय और समर्पित रहीं महाश्वेता देवी जैसी लेखिका शताब्दियों में पैदा होती हैं। मैं उनके निधन पर शोक प्रकट करता हूं तथा उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करता हूं।’

गौरतलब है कि महाश्वेता देवी को 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा साहित्य के लिए उन्हें 1997 में रमन मैग्सायसाय पुरस्कार से नवाजा गया था। भारत सरकार ने उन्हें 1986 में पद्मश्री और 2006 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।

हिन्दी की लब्ध प्रतिष्ठित लेखिका कृष्णा सोबती ने ‘भाषा’ से कहा, ‘महाश्वेता जी बहुत बड़ी लेखिका थीं और उन्होंने भारतीय साहित्यकारों को बहुत सारे रास्ते दिखाये। आम तौर ऐसी जगहों (कल्पनाशीलता और जीवन की सच्चाई) से हम इससे पहले अंजान थे।’

उन्होंने कहा, ‘हम जब महाश्वेता जी से बात करते थे तो महसूस होता था कि किसी लेखक से बात कर रहे हैं। सामाजिक जीवन के उनके अनुभव उन्हें एक बड़ी लेखिका बनाते हैं, जो उनके रचना संसार को विशाल रूप दे देते हैं।’

सोबती ने कहा, ‘लेखक और लेखिका के समझने और उसे वर्णन करने में बहुत अंतर होता है। लेखकों ने जिन चीजों को नहीं उभारा था, महाश्वेता जी उस जगह तक पहुंच सकीं। यही उन्हें बड़ा रचनाकार बनाती है।’

उन्होंने कहा, ‘अक्सर रचनाकार सत्ता और समाज के संतुलन बनाते हुए अपनी बात लिखता है, लेकिन बहुत कम लेखक महाश्वेता देवी की तरह बेखौफ होकर अपनी बात कहते हैं।’ ललित कला अकादेमी के पूर्व अध्यक्ष और कवि अशोक बाजपेयी ने कहा, ‘मुझे लगता है कि यह मूर्धन्यों के प्रयाण का वक्त हैं। रंगकर्मी एवं कवि केएन पणिक्कर, चित्रकार केजी सुब्रह्मणयम और रजा साहब का हाल ही में निधन हुआ है।..और अब महाश्वेता जी का जाना भारतीय साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति हैं। वह भारतीय साहित्य में साहस और अंत: करण की आवाज उठाने वाली विरली रचनाकार थीं।’

उन्होंने कहा, ‘महाश्वेता देवी ने एक तरफ नक्सलवादी युवकों की आवाज को उठाया और दूसरी तरफ दलित एवं आदिवासियों के जीवन को अपने साहित्य का हिस्सा बनाया।..और ना केवल इन पर लिखा बल्कि उनके बीच रहकर काम किया और अपने लेखन से मिलने वाली राशि का बड़ा हिस्सा उन्हें दे दिया। आम तौर पर ये समाज के ऐसे पहलू हैं जो साहित्य से अछूते ही रह जाते थे।’

उन्होंने कहा, ‘वह (महाश्वेता देवी) स्त्री स्वतंत्रता को शक्ति और उर्जा के साथ उठाने वाली रचनाकार रही हैं।’ इधर, साहित्य अकादेमी ने भारतीय भाषाओं के रचनाकारों की तरफ से महाश्वेता देवी के निधन पर गहरा शोक जताया है।

अकादेमी ने अपने बयान में कहा, ‘प्रख्यात बांग्ला लेखिका और समाजसेवी महाश्वेता देवी के जाने से जनजातीय और आदिवासी अधिकारों का मुखर प्रवक्ता हमसे विदा हो गया। साथ ही भारतीय साहित्य का शीर्ष स्तंभ ढह गया।’