और यहां अपने ही सरकारी तंत्र से हार जाते हैं सरहदों की रक्षा करने वाले वीर योद्धा

उत्तराखंड में बहुत से ऐसे गांव है जहां की 90 फीसदी से ज्यादा की आबादी आज भी यहां की सैन्य परम्पराओं को आगे बढ़ाने के काम को बखूबी से निभा रही हैं। अफसोस की बात यह है कि अपनी जान हथेली पर रखकर सीमाओं की रक्षा करने वाले इन सैनिकों के आज के बदलते दौर में भी गांवों की सीमाओं की तस्वीर जब सामने आती है तो शर्म से सिर झुक जाता है।

पौड़ी जिला में एक ऐसा ही गांव है। गांव में 90 फीसदी से ज्यादा की आबादी सैनिक परिवारों की है, लेकिन अफसोस देश की खातिर कुर्बान होने वाले इस गांव की जमीनी हकीकत जब सामने आती है तो सैनिकों के प्रति सम्मान की पोल भी खुल जाती है।

उत्तराखंड की सैन्य परम्पराओं को आगे बढ़ाता लैंसडाउन तहसील का बटलबाड़ी गांव दरअसल पूरे उत्तराखंड में सैन्य परम्पराओं को जीवित रखने में इस गांव की जो मिसाल दी जाती है, वह शायद ही किसी और गांव की दी जाती हो।

इस गांव की 90 फीसदी से ज्यादा की आबादी आज भी सैन्य परम्पराओं का निर्वहन कर रही है। हैरानी की बात यह है कि इस गांव का शायद ही कोई घर ऐसा होगा, जहां से भारत माता की रक्षा के लिए किसी वीर सपूत ने जन्म न लिया हो। लेकिन अफसोस जान हथेली पर रखकर सीमाओं पर दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले यह वीर जाबांज सैनिक अपने खुद के सरकारी तंत्र से ही हार गए हैं।

आजादी के 69 साल गुजर जाने के बावजूद मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस गांव के लोग आज भी मीलों पैदल दूरी तय करके असली आजादी के मायने तलाश रहे हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि बटलबाड़ी गांव के निवासियों ने अपने खुद के सरकारी तंत्र से सुविधाओं के लिए लड़ाई न लड़ी हो। लेकिन गांव में निवास करने वाले पूर्व सैनिकों की मानें तो सीमाओं पर दुश्मन से लड़ाई लड़ना आसान है, बजाय अपने खुद के सरकारी तंत्र से।

देश के लिए जान हथेली पर रखकर सीमाओं की रखवाली में लगे सैनिकों को अपना खुद का सरकारी तंत्र कैसे भूल जाता है, इसका बटलबाड़ी गांव से बेहतर शायद ही कोई उदाहरण हो। सड़क-पानी के लिए अपने तंत्र से लड़ने वाले 90 फीसदी सैन्य आबादी वाले इस गांव की हमारे हुकमरानों को तभी याद आती है जब चुनाव पास होते हैं। ऐसे में सुविधाओं से वंचित रहने वाले इस गांव के सैनिक अब अपने खुद के देश मे ही अपने को बेगाना महूसस कर रहे हैं।