देवों के देव महादेव के पंच केदारों में से एक तुंगनाथ अन्य केदारों की तुलना विशेष महत्व इसलिए भी रखता है, क्योंकि यह स्थान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम से भी जुड़ा हुआ है। कहते हैं कि यहां रामचंद्र ने अपने जीवन के कुछ क्षण एकांत में बिताए थे।

पंचकेदारों में द्वितीय केदार के नाम से प्रसिद्ध तुंगनाथ की स्थापना कैसे हुई, यह बात किसी भी शिवभक्त से छिपी नहीं है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपनों को मारने के बाद व्याकुल थे। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए वे महर्षि व्यास के पास गए। व्यास ने उन्हें बताया कि अपने भाईयों और गुरुओं को मारने के बाद वे ब्रह्म हत्या के कोप में आ चुके हैं। उन्हें सिर्फ महादेव शिव ही बचा सकते हैं।

व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहंचे, लेकिन शिव महाभारत के युद्ध के चलते नाराज थे। इसलिए उन सभी को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच भैंसा (इसीलिए शिव को महेश के नाम से भी जाना जाता है।) का रूप धारण कर निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने भैंसे का पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए।

कहते हैं कि तुंगनाथ में ‘बाहु’ यानी शिव के हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर करीब एक हजार साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पांडवों ने ही इस मंदिर की स्थापना की थी। पंचकेदारों में यह मंदिर सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान है। यह 368 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है और पर्यटन स्थल चोपटा से 3 किलोमीटर दूर स्थित है।

पुराणों में कहा गया है कि भगवान रामचंद्र शिव को अपना भगवान मानकर पूजते थे। कहते हैं कि लंकापति रावण का वध करने के बाद रामचंद्र ने तुंगनाथ से डेढ़ किलोमीटर दूर चंद्रशिला पर आकर ध्यान किया था। रामचंद्र ने यहां कुछ वक्त बिताया था। चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चंद्रशिला पहुंचकर विराट हिमालय की सुदंर छटा का आनंद लिया जा सकता है।

सर्दियों के वक्त बर्फ पड़ने की वजह से शिवलिंग को यहां से चोपटा लाया जाता है। इस दौरान ग्रामीण पूरे ढोल के साथ शिव को ले जाते हैं और गर्मियों में वापस रखते हैं। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर एटकिन्सन ने कहा था कि जिसने अपने जीवन में चोपटा नहीं देखा, उसका जीवन व्यर्थ है।