अस्थायी राजधानी देहरादून में बीजेपी विधायक गणेश जोशी के कथित हमले में घायल हुए पुलिस के घोड़े शक्तिमान की प्रतिमा के अनावरण से मुख्यमंत्री हरीश रावत ने ऐन वक्त पर कन्नी काट ली।

बता दें कि सीएम ने यह फैसला तब लिया जब अधिकारी शक्तिमान की प्रतिमा के अनावरण की पूरी तैयारी कर चुके थे। अधिकारी भी सीएम की तरफ से इनकार सुनकर भौचक्के रह गए। हरीश रावत द्वारा प्रतिमा के अनावरण से इनकार से कई सारे सवाल खड़े हो रहे हैं।

सवाल उठ रहे हैं कि शक्तिमान का मुद्दा जोर-शोर से उठाने वाले हरीश रावत ने आखिर किस वजह से ऐन मौके पर प्रतिमा अनावरण से कदम पीछे खींच लिए। हालांकि मुख्यमंत्री ने कहा है कि वह इसे राजनैतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहते। पर यह कितना सच है?

14 मार्च को विधानसभा के सामने हुई बीजेपी की रैली में पुलिस के घोड़े शक्तिमान की टांग टूट गई थी। शक्तिमान के घायल होने की वजह बीजेपी विधायक गणेश जोशी द्वारा उस पर हमला बताया गया।

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शक्तिमान पर हमला करते हुए विधायक गणेश जोशी की तस्वीरें वायरल हो गई थीं। इसे देश दुनिया में खूब देखा गया था। इस मामले में बीजेपी विधायक पर मुकदमा भी दर्ज हुआ।

शक्तिमान के इलाज के लिए अमेरिका से डॉक्टर बुलाए गए। घोड़े को गैंगरीन फैलने से बचाने के लिए घायल टांग को काटना पड़ा था। उसकी जगह नई कृत्रिम टांग लगाई गई, लेकिन इन सबके बावजूद शक्तिमान को बचाया नहीं जा सका।

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टांग के इलाज के लिए एनेस्थीसिया देने के दौरान शक्तिमान की मौत हो गई। इसके बाद शक्तिमान को सम्मान देने की राजनीति शुरू हुई। शक्तिमान की मौत एक बार फिर सुर्खी बनी।

उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने शक्तिमान को सम्मान देने की बात कहते हुए अस्थायी राजधानी देहरादून के रिस्पना चौक पर शक्तिमान की प्रतिमा लगाने का फैसला लिया। रिस्पना चौक का नाम शक्तिमान चौक रखने का फैसला लिया गया। पुलिस ने भी अस्तबल के बाहर शक्तिमान की प्रतिमा लगाने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए।

पुलिस लाइन की प्रतिमा करीब दस दिन पहले बनकर तैयार हो गई थी, जबकि रिस्पना पुल की प्रतिमा को तीन दिन पहले स्थापित किया गया। एमडीडीए को उसके सौंदर्यकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इसी दौरान शक्तिमान की प्रतिमा लगाने को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध होने लगा। चर्चाएं होने लगीं कि सरकार उत्तराखंड की महान विभूतियों को छोड़कर घोड़े की प्रतिमा लगा रही है, जो गलत है। गौरतलब है कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन के आंदोलनकारियों को सम्मान देने की मांग उत्तराखंड में होती रही है।

आंदोलन में भाग लेने वाले कहते रहे हैं कि अलग राज्य बनने के 16 साल बाद अभी तक की सरकारें आंदोलनकारियों को उचित सम्मान नहीं दे पाई है। माना जा रहा है ‌प्रतिमा अनावरण के बाद किसी विवाद से बचने के लिए मुख्यमंत्री ने प्रतिमा अनावरण से कदम पीछे खींचे हैं। वहीं कुछ चर्चा यह भी है कि इस फैसले के पीछे कोई टोटका है।

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सीएम हरीश रावत को धर्म-कर्म में बहुत विश्वास करने वाला माना जाता है। कहा जाता है कि हर काम के पहले सीएम शुभ मुहूर्त का जरूर ध्यान देते हैं। विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के दौरान भी यह बात सामने आई थी। उस दौरान सीएम अपने एक हाथ में कोई चीज रखे हुए थे और एक हाथ में उसे लिए हुए घूमते रहे थे। सीएम की इस तस्वीर ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं।

ऐसे में सवाल यह है कि सीएम ने शक्तिमान की प्रतिमा अनावरण से पीछे हटने के पीछे विरोध वजह है या टोटका? या फिर कोई तीसरी वजह जैसा कि सीएम खुद कह रहे हैं कि वह इसे राजनैतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहते?