उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में आज भी सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां पहुंच पाना किसी चुनौती से कम नही है। इन गांवों को मुख्यधारा लाने के लिए सड़क की मांग दशकों से उठती रही है। ऐसी ही मांग को लेकर पिथौरागढ़ के चौड़मन्या क्षेत्र के लोग इन दिनों प्रदर्शन कर रहे हैं। सड़क की मांग को लेकर पिछले 15 दिनों से सड़क की मांग को लेकर जिला मुख्यालय में आंदोलन पर डटे हैं।

बता दें कि बेरीनाग ब्लॉक के एक दर्जन से अधिक गांव आजादी के बाद से ही सड़क की गुहार लगा रहे हैं। अपनी मांग मंगवाने के लिए यहां के लोगों ने दर्जनों आंदोलन किए। लेकिन इसके बावजूद इनकी फरियाद आज तक नहीं सुनी गई। खुद की बेरुखी से नाराज यहां के लोगों ने अब आर-पार की लड़ाई की मन बना लिया है।

आलम ये है कि क्षेत्रवासी पिछले 15 दिनों से अपना सबकुछ छोड़कर डीएम कार्यालय पर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन फिर भी नतीजा सिफर ही नजर आ रहा है। आंदोलनकारी उमेद सिंह का कहना है कि उनके इलाके में सड़क नहीं होने से दर्जनों लोग बेवक्त मौत के मुंह में जा चुके हैं। सड़क के लिए उन्होंने कई आंदोलन कर किए हैं, लेकिन हुक्मरानों के नींद नहीं टूटी है।

इस इलाके को मुख्यधारा में लाने के लिए 10 सड़कें प्रस्तावित हैं, जिनकी फाइलें आज भी विभागों में धूल फांक रही है। वन अधिनियम और विभागीय हीला-हवाली के चलते हजारों की आबादी आदिम युग जैसा जीवन जीने को मजबूर है।

अपनी मांगों को मंगवाने के लिए ग्रामीणों ने पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का नारा भी बुलंद किया था। फिर भी यहां की सुध किसी ने नहीं ली। वहीं डीएम पिथौरागढ़ एच.सी. सेमवाल कहते हैं कि मामला वनअधिनियम के कारण लटका है। फोरेस्ट से सहमति मिलते ही सड़क निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

यह बात को कोई भी सह सकता है कि लोकतंत्र में चुनाव बहिष्कार को जायज नहीं कहा जा सकता, लेकिन लाख टके का सवाल ये भी है कि क्या इस लोकतंत्र में दूर-दराज के इलाकों में बैठे लोगों की फरियाद यूं ही अनसुनी रहेगी। या फिर इन्हें अपनी मांगों को मंगवाने के लिए आंदोलन से हटकर कोई और रास्ता तलाशना पड़ेगा।