भीमताल: जसूलीशौक्यानी धर्मशालाओं का संरक्षण एवं संवर्द्धन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला

संस्कृति विभाग तथा रं कं संस्था के संयुक्त तत्वाधान में मत्सकीय अनुसंधान संस्थान सभागार भीमताल में उत्तराखण्ड के धरोहर – जसुली शौक्याणी निर्मित धर्मशालाओं का संरक्षण एवं संवर्द्धन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का दीप प्रज्जवलित कर शुभारम्भ प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव डा0 आरएस टोलिया, इतिहासकार डा0 यशोधर मठपाल तथा पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त एवं मुख्य सचिव नृप सिंह नपलच्याल द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डा0 आरएस टोलिया ने कहा कि धर्मशाला हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान है। बदलते भौतिकवादी युग में धर्मशाला एवं इसका अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया है। अवशेष धर्मशालाएं हमारी पुरातन संस्कृति के प्रतीक रूप में रह गयी हैं, जिनके संरक्षण एवं संवर्द्धन की जरूरत है।

उन्होनें बताया कि रं शौका समुदाय के बीच ग्राम दातू में जसूली शौक्यानी धनाड्य एवं धार्मिक प्रवृत्ति की महिला ने ब्रिटिश काल के समय पर्वतीय क्षेत्रों के दुर्गम इलाकों में उत्तराखण्डी संस्कृति पर आधारित धर्मशालाओं को निर्माण कराया गया। जनजाति समुदाय की इस महिला के निर्माण को तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने काफी सराहा और उनके साथ मिलकर एक कार्ययोजना तैयार करते हुए धर्मशालाओं को निर्माण कराया।

अपने सम्बोधन में पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त नृपसिंह नपलच्याल ने कहा कि दारमा परगने की जसूलीशौक्यानी ने तत्कालीन कुमायूं कमीश्नर के सहयोग से समस्त कुमायूं एवं गढ़वाल से लेकर नेपाल व तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों में यात्रियों एवं व्यापारियों के विश्राम हेतु धर्मशालाओं को निर्मित किया था। उन्होनें कहा कि 19वीं सदी में निर्मित लगभग 200 धर्मशालाओं के महत्व को तत्कालीन परिपेक्ष्य में आकलन करने पर हम महसूस कर सकते हैं कि उसे सुरक्षा एवं आश्रय देते हुए ये धर्मशालाएं व्यापारिक संस्कृति एवं धार्मिक दृष्टि से समाज को गतिमान बनाये रखने में इनका ऐतिहासिक महत्व रहा है। उन्होनें आज के दौर में इस धरोहर को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

अपने सम्बोधन में महान साहित्यकार डा0 यशोधर मठपाल ने कहा कि जसूलीशौक्यानी की दानवीरता, विवेकशीलता, जन समुदाय के प्रति समर्पण एवं सहयोग की भावना को स्पष्ट एवं प्रखर कर रं समुदाय की ऐतिहासिकता को प्रतिबिम्बित एवं प्रमाणित करता यह धरोहर आज उत्तराखण्ड के इतिहास मे आज रूग्ण और विक्षिप्त पडा है। डा0 मठपाल ने कहा कि प्रदेश सरकार को चाहिए कि इस प्रकार की पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण की दिशा में कार्य करें।

अपने सम्बोधन में आयुक्त गढ़वाल एवं सचिव परिवहन चन्द्र सिंह नपलच्याल ने कहा कि आज इन धरोहर के संस्कृति, सामाजिक एवं ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए उसके संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में कार्य करना अपरिहार्य है। इस निमित इस कार्यशाला का आयोजन हमें इस विषय पर विस्तृत चर्चा कर जानकारियों का आदान-प्रदान करने, अभिलेखों का संकलन, धर्मशालाओं का सूचीकरण, पूर्व में किये गये प्रयासों एवं विभिन्न प्रस्तावों की समीक्षा, शोध एवं सर्वेक्षण पर विचार, संरक्षण एवं संवर्धन के उपायों पर विचार कर एक कार्यवृत तैयार करना तथा अंततोग्तवा उत्तराखण्ड के धरोहरों में शामिल करना है।

कार्यशाला में पंकज पतियाल तथा रवि पतियाल द्वारा जसूली शौेक्यानी की उपलब्धियों पर आयोजित फोटो प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सचिव लोनिवि अरविन्द सिंह हयांकी, डीआईजी पुष्कर सिंह सैलाल, कुमायूं विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष इतिहास अनिल जोशी आदि मौजूद थे।