कुमांऊ में हरियाली का त्योहार हरेला धूम-धाम से मनाया जाता है। इसके लिए यहां सात अनाजों को मिलाकर हरेला बोया जाता है। 9 दिनों तक सुबह-शाम हरेला का पालन पोषण किया जाता है और इसके बाद 10 दिन हरेला को काटा जाएगा। और हां हरेला को अंधेरे में ही उगाया जाता है, धूम में नहीं रखा जाता। यही कारण है कि इसका रंग पीला होता है।

इस साल 16 जुलाई को हरेला पर्व मनाया जाएगा। इसके लिए गुरुवार को हरेला बो दिया गया है। इस मौके पर बड़े अपने बच्चों को तरक्की का आशीर्वाद देते हैं। हरेला काटने के साथ ही भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है।

कई सदियों से हरेला पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है। नौकरी के लिए बाहर गए युवा हरेले में बड़ों का आशीर्वाद लेने श्रावण माह के पहले दिन घर पहुंचते हैं। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शंकर ने पिया और संसार को हराभरा करने का संदेश दिया। इसीलिए हरेले के दिन से एक माह तक श्रावण माह में शिव को जल चढाया जाता है।

घर की बुजुर्ग महिलाएं हरेले के लिए सात अनाजों का इंतजाम कई दिनों के करके रखती हैं, एक दिन पहले खेत से मिट्टी को खोदकर सुखाया जाता है। हरेले की परम्परा सदियों से चली आ रही है, पिछले साल मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सभी गांवों में हरेला प्रतियोगिता मनाने का ऐलान किया। प्रतियोगिता जीतने वाली महिला को 500 रुपया प्रतिमाह दिया, साथ ही यह भी मान्यता है कि खरीफ फसल की रक्षा के लिए भगवान से खुश किया जाता है।