नैनीताल : बंद हो गया अंग्रेजों के जमाने का प्राइमरी स्कूल, बना शराबियों-जुआरियों का अड्डा

साभार - प्रदेश18

नैनीताल स्थित एक ब्रिटिशकालीन प्राइमरी स्कूल बंद हो गया है। हद तो यह है कि अफसरों की लापरवाही के चलते जुआरियों और शराबियों ने इस स्कूल को पाठशाला की जगह मधुशाला बना दिया है। नैनीताल शहर से सटे नारायण नगर प्राइमरी स्कूल परिसर को शराबियों और जुआरियों ने अपना अड्डा बना रखा है।

आजादी से पहले ब्रिटिशकाल में बना यह प्राइमरी स्कूल मौजूदा सत्र से बंद कर दिया गया है। गांव के लोग बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोग इसी स्कूल में पढ़कर आज सरकारी नौकरियों में कई अहम पदों पर हैं, लेकिन अब यह स्कूल बंद कर दिया गया है।

सरकारी विभाग में कार्यरत प्रदीप आर्या कहते हैं कि कई बार विभागीय अधिकारियों से कहा गया, लेकिन कोई पहल नहीं की गई। पहले से स्कूल का पुराना निर्माण गिरासू हो गया था, लेकिन कुछ समय पहले बना नया भवन भी गिरने की कगार पर है। नियमों का पालन किए बिना निर्माण करा दिया गया था, लेकिन उद्घाटन नहीं हुआ।

गांव के ही मोहन चंद्र बताते हैं कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को कई बार लिखित शिकायत की गई कि स्कूल में प्रशिक्षित और काबिल शिक्षक नियुक्त किए जाएं, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। जिस टीचर की नियुक्ति यहां की गई थी उसे सामान्य ज्ञान तक की जानकारी नहीं थी, इसलिए मजबूरन लोगों ने अपने बच्चों का दाखिला शहर के स्कूलो में करा दिया।

शिक्षा विभाग और प्रशासन इस ब्रिटिशकालीन स्कूल को बच्चों के लिए मुफीद नहीं बना सका। पहले संख्या कम हुई और फिर काबिल शिक्षकों के अभाव में शून्य हो गई। पुराने गिरासू भवन की जगह नए कमरे लाखों खर्च कर बनाए गए, लेकिन उनमें पढ़ाई तो दूर उद्घाटन तक नहीं हो सका। अब वह भी ढहने की कगार पर हैं।

नैनीताल के डीएम दीपक रावत के मुताबिक छात्र संख्या शून्य होने की वजह से प्राइमरी स्कूल शिक्षा विभाग ने बंद कर दिया है। स्कूल खोलने की कोशिश फिर से की जाएगी और सर्वे कराया जाएगा। शिक्षा का अधिकार बच्चों को आखिर कैसे मिलेगा जब बड़ों को ही स्कूल की फिक्र नहीं है। जिम्मेदार अधिकारी यदि समय रहते पहल करते तो यहां की तस्वीर शायद अलग होती।

फिलहाल सवाल यह है कि सरकारी प्राइमरी स्कूलों से मोह भंग होने की असली वजह क्या है? इसका जवाब तलाशने के लिए शिक्षा विभाग और सर्व शिक्षा अभियान चलाने वाली सरकारी एजेंसियों को गंभीरता से अध्ययन करने की जरूरत है जिससे प्राथमिक स्कूलों के बारे में लोगों की धारणा को बदला जा सके और सभी को शिक्षित बनाने का सपना साकार हो सके।