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आषाढ शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा इतनी भव्य होती है कि कहते हैं देवता भी इसे देखने के लिए धरती पर उतर आते हैं। चार धामों में से एक है भगवान जगन्नाथ का मंदिर। भारत के उत्तर में ब्रदीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम में द्वारका तो पूर्व में पुरी में स्थित है भगवान जगन्नाथ का मंदिर।

जगन्नाथ रथ यात्रा की भव्यता, इसके महत्व और यहां जुडने वाली अथाह भीड़ से तो आप परिचित हैं, लेकिन इस यात्रा के कई ऐसे पहलु भी हैं, जिनसे हो सकता है आप अंजान हों। प्रसिद्ध वास्तु विशेषज्ञ नरेश सिंगल रथयात्रा से जुडे ऐसे ही कुछ वैज्ञानिक व वास्तु सम्मत पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं।

अगर संक्षेप में कहा जाए तो भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा धर्म, अर्थ और मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसी बात को दर्शाते हैं भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की भव्य मूर्तियों के रंग और उनके रथों का आकार-प्रकार।

भगवान जगन्नाथ के रथ की ऊंचाई 45 फुट की होती है व प्रतीमा काले रंग से रंगी जाती है, तो बलराम और सुभद्रा की 44 व 43 फुट ऊंची प्रतिमाएं क्रमशः सफेद व पीले रंग की होती हैं। प्रतिमाओं के ये तीनों रंग वास्तव में शक्ति, सामर्थ्य और ज्ञान के प्रतीक हैं, जो मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष प्रदान कराते हैं।

प्रतिमाओं की ऊंचाई का क्रमशः 45, 44 व 43 फुट ऊंचा होना असल में 9 ग्रहों 4 एवं 5 का योग, 8 दिशाओं 4 एवं 4 का योग तथा सप्ताह के सात दिनों 4 एवं 3 के योग को भी दर्शाता है। इसका अर्थ यह भी है कि भगवान जगन्नाथ दिशाओं, ग्रहों और समय के प्रत्येक भाग में व्याप्त हैं।

यही नहीं, भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा का काला रंग एवं उनके रथ के घोड़े का सफेद रंग इस बात को परिभाषित करता है कि शक्ति, काला रंग जिसका प्रतीक है उस पर सफेद यानी ज्ञान के माध्यम से नियंत्रण पाया जा सकता है। यहां शक्ति का अभिप्राय शारीरिक क्षमता से ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक शक्ति से भी लिया जा सकता है।

वहीं बलराम की प्रतिमा का सफेद रंग एवं उनके घोडे का काला रंग इस बात को बताता है कि महज ज्ञान जिस पर शक्ति यानी अंकुश न हो वह व्यक्ति को दंभी बना देता है। सुभद्रा की प्रतिमा का पीला रंग गुरू की आवश्यकता और महत्व को परिभाषित करता है। पीला रंग करुणा का भी है। इसका अर्थ कि ज्ञान व शक्ति प्राप्त करने के लिए गुरू की करुणा आवश्यक है।

यह तो विदित ही होगा कि भगवान जगन्नाथ की यात्रा के लिए प्रतिमाएं नीम की लकडी से एवं रथ फस्सी एवं धोसा लकडियों से बनाए जाते हैं। लगभग दो महीने पहले इन्हें बनाने का कार्य आरम्भ होता है। अहम् तथ्य यह भी है कि 12वीं सदी से एक ही परिवार के लोग भगवान के इन रथों को खींचते हैं, जिन्हें सिंहद्वार से निकालकर पहले मासीमां मंदिर ले जाया जाता है और उसके बाद लगभग 2 किलोमीटर की यात्रा के बाद गुडीचा मंदिर में ले जाया जाता है।