साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा से सिर्फ जन-धन की हानि ही नहीं हुई, बल्कि भौगोलिक स्थिति को भी प्रभावित किया है। मुख्य धारा पर मिट्टी, रेत-बजरी के जमाव से नदियों के रास्तों में बदलाव आ गया है। इसके अलावा मिट्टी की ऊपरी सतह के बह जाने से मंदाकिनी घाटी सहित अन्य क्षेत्र भूस्खलन के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गए हैं।

इससे बारिश के दौरान यहां खतरे बढ़ गए हैं। नदियों की धारा के इस बदलाव से कटान के कारण नए भूस्खलन जोन पैदा हो गए हैं, जिन्हें अभी चिन्हित नहीं किया गया। विज्ञानियों का कहना है कि तेज बारिश में यहां भूस्खलन जल्दी और अधिक हो सकता है।

आपदा के बाद यह बदलाव मंदाकिनी घाटी में अधिक आया है। मंदाकिनी और इसकी सहयोगी नदियों के रास्तों में बदलाव की पुष्टि हो चुकी है। मंदाकिनी नदी में सोनप्रयाग, सीतापुर, बांसबाड़ा, सियालसौड़ चंद्रपुरी, गबनी, गंगानगर, विजयनगर, रामपुर, तिलवाड़ा आदि स्थानों पर नदी की धारा अपने स्थान से खिसकी है।

इसी तरह मध्यमहेश्वर ने गौंडर और पौंडर में अपने रास्ते में बदलाव किया है। इस बदलाव नदियों के बेसिन का पूरा सिस्टम ही बदल रहा है। अपने मुख्य मार्ग से नदी की धार तेज बारिश में बेलगाम हो सकती है।

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों और आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन विभाग ने मौके पर जाकर बदलाव की स्थिति देखी है। विज्ञानियों का कहना है कि आपदा के दौरान रिवरबेड पर मिट्टी, चूना, रेत-बजरी (सेडीमेंटेशन) जमा हो गया है, जिससे नदियों के किनारे कटकर ढह गए।

नदियों पर काम कर रहे वाडिया के वरिष्ठ विज्ञानी डॉ. संतोष राय का कहना है कि ‘रिवरबेड पर सेडीमेंटेशन बढ़ने से धारा बदल जाती है।’ इसके अलावा पहाड़ों की ऊपरी सतह से मिट्टी के साथ इसे बांधे रखने वाली वनस्पतियां बह गई हैं। इससे मिट्टी धसकने का खतरा बढ़ गया।