चार जुलाई से प्रस्तावित उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में बजट लाने की राह हरीश रावत सरकार के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं रहने वाली है। इसे लेकर संवैधानिक रूप से कई सवाल खड़े हैं, जिनका जवाब खुद सरकार को सत्र से पहले ढूंढना होगा।

मार्च में शुरू हुई राजनैतिक लड़ाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में हरीश रावत द्वारा मनी बिल पास होने का हलफनामा दाखिल करना और केंद्र सरकार द्वारा मनी बिल पास नहीं होने की दशा में राज्य का लेखानुदान संसद से पास कराना, दोनों ही आपस में विरोधाभासी घटनाएं हैं।

सवाल यही है कि क्या हरीश रावत अपने उस हलफनामे को वापस लेंगे या केंद्र 18 मार्च के मनी बिल पास होने की बात से सहमत हो जाएगा, दोनों ही असंभव है। इन तमाम बिन्दुओं के मद्देनजर कई राजनीतिक चिंतक तो सत्र के आयोजन पर भी अभी से संदेह जताने लगे हैं।

राज्य सरकार ने 4 और 5 जुलाई को बजट के लिए विशेष सत्र बुलाया है। कैबिनेट से चालीस हजार करोड़ के बजट को पारित करने के प्रस्ताव पर मुहर लग चुकी है। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में मनी बिल पर 12 जुलाई को सुनवाई होनी है, जिससे पहले सरकार सदन में बजट पास करवाएगी।

विशेष सत्र में सरकार चार माह के लेखानुदान के बाद शेष बजट को पारित करवाने की कोशिश करेगी। हालांकि सरकार यह कह रही है कि मनी बिल पास है तो उसे बजट लाने की जरूरत क्या आन पड़ी। सरकार के बजट सत्र से सुप्रीम कोर्ट में 12 जुलाई को होने वाली सुनवाई में केंद्र को यह साबित करने का एक आधार मिल सकता है कि मनी बिल पास नहीं हुआ।

इन स्थितियों में सरकार का विशेष सत्र बुलाकर बजट पारित करने पर विपक्ष पहले ही सवाल खड़े कर रहा है। बजट सत्र में अगर सरकार बजट पास कर लेती है तो 18 मार्च की स्थिति को लेकर फिर सवाल खड़ा हो जाएगा।

अगर मुख्यमंत्री हरीश रावत सुप्रीम कोर्ट से अपना हलफनामा वापिस लेते हैं कि मनी बिल पास नहीं हुआ तो 18 मार्च को सरकार के अल्पमत में होने का सवाल खड़ा हो जाएगा। ऐसे में सत्र के दौरान सरकार बजट को किस रूप में लाती है यह देखना अहम रहेगा। सरकार का कदम पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।