‘जम्बो’ के हाथों में टीम इंडिया, वक्त बताएगा कोच के तौर पर कितने सफल होंगे कुम्बले

भारतीय क्रिकेट टीम के नए मुख्य कोच के नाम की घोषणा हो चुकी है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने धर्मशाला में गुरुवार को इस पद पर कुम्बले के नाम की घोषणा की। एक खिलाड़ी के तौर पर कुम्बले ने तमाम कीर्तिमान अपने नाम किए हैं, लेकिन एक कोच के तौर पर उनकी सफलता गुजरते वक्त के साथ ही पता चल पाएगी।

कुम्बले का चयन इस पद के लिए आवेदन करने वाले 57 लोगों में से किया गया है। कुम्बले ने तमाम काबिल उम्मीदवारों के साथ मंगलवार को बीसीसीआई की क्रिकेट सलाहकार समिति के सदस्य अपने पूर्व साथी सचिन तेंदुलकर, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली के सामने कोलकाता में इंटरव्यू दिया था।

कुम्बले के पास बेशक कोचिंग के अनुभव की कमी है और उनका चयन कई ऐसे लोगों के ऊपर किया गया है, जिनके पास काफी अनुभव था, लेकिन कुम्बले का मैदान का अनुभव उनके काम आया। कुम्बले भारत के लिए सबसे अधिक 619 टेस्ट विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं।

अपने 18 साल के क्रिकेट करियर में कुम्बले ने एक खिलाड़ी के तौर पर कई मील के पत्थर स्थापित किए। वह टेस्ट इतिहास में सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाजों की सूची में तीसरे स्थान पर हैं। यही नहीं, कुम्बले दूसरे ऐसे गेंदबाज हैं जिन्होने टेस्ट की एक पारी में 10 विकेट लिए हैं। यह कीर्तिमान कुम्बले ने 1999 में दिल्ली में पाकिस्तान के खिलाफ किया था। कुम्बले ने 74 रन देकर 10 विकेट हासिल किए थे।

साल 2007 में कुम्बले को टेस्ट टीम का कप्तान बनाया गया था। भारत का 14 टेस्ट मैचों में नेतृत्व करने के बाद कुम्बले ने संन्यास लिया। वह कप्तान के तौर पर क्रिकेट से विदा हुए थे। जनवरी 2008 में भारत ने कुम्बले की देखरेख में सिडनी टेस्ट में ऐतिहासिक सफलता दर्ज की थी। यह वही मैच था, जिसके दौरान भारतीय टीम पर नस्लीय टिप्पणी का आरोप लगा था।

संन्यास के बाद कुम्बले ने क्रिकेट प्रशासक के तौर पर अच्छा काम किया और नवम्बर 2010 में कर्नाटक क्रिकेट संघ के अध्यक्ष चुने गए। साथ ही वह बेंगलुरू स्थित राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी के अध्यक्ष और बीसीसीआई की तकनीकी समिति के भी अध्यक्ष रहे।

तमाम अनुभवों के बीच कुम्बले के आलोचक इस बात को लेकर आलोचना के मूड में हैं कि आखिरकार बीसीसीआई ने ऐसे किसी व्यक्ति को कोच क्यों चुना, जिसके पास कोचिंग का कोई अनुभव नहीं है। यह कुम्बले के लिए एक चुनौतीपूर्ण सवाल है। वह इसके लिए तैयार भी होंगे क्योंकि एक खिलाड़ी और प्रशासक के तौर पर उन्हें किसी को कोई जवाब नहीं देना पड़ा है, लेकिन एक कोच के तौर पर नाकाम होने के बाद वह सवालों से घिर सकते हैं।

कुम्बले कोच के तौर पर अपने पहले दौरे में टीम के साथ वेस्टइंडीज में होंगे, जहां टीम चार मैचों की टेस्ट सीरीज खेलेगी। कुम्बले एक संजीदा इंसान हैं और टेस्ट टीम की कमान एक युवा कप्तान के हाथों में है, जो मैदान के अंदर और मैदान के बाहर काफी आक्रामक रुख रखता है।

अब देखने वाली बात यह है कि कुम्बले युवाओं के साथ किस हद तक तालमेल बना पाते हैं। देखने वाली बात होगी कि क्या वह रवि शास्त्री से बेहतर कोच साबित होंगे, जिनकी देखरेख मे भारत ने डंकन फ्लेचर की विदाई के बाद कई सफलताएं हासिल की हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि कोच पद के लिए आवेदन करने वालों में शास्त्री भी थे और उन्हें इस अहम पद के लिए नजरअंदाज किया गया है। बोर्ड कुम्बले के सहयोगी स्टाफ के नामों की घोषणा बाद में करेगा और अगर उसमें शास्त्री का भी नाम शामिल रहे तो भी लोग यह देखना चाहेंगे कि आखिरकार कुम्बले एक ऐसे साथी के साथ कैसी साझेदारी निभाते हैं, जिसे कोच पद के लिए नजरअंदाज किया गया है और बोर्ड ने इससे जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया है।

बोर्ड प्रमुख अनुराग ठाकुर ने इतना जरूर कहा कि बोर्ड को कुम्बले पर पूरा भरोसा है और उसने एक ऐसे व्यक्ति को कोच चुना है, जो इस पद के काबिल था। ठाकुर ने यह भी कहा कि देसी या विदेशी का सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए क्योंकि भारतीय टीम को एक सबसे अच्छे कोच की जरूरत थी और बोर्ड ने इसी दिशा में सोचते हुए फैसला किया है।

जाहिर है, बोर्ड को कुम्बले पर भरोसा है। यह भरोसा उनके भारी-भरकम अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड और संजीदा व्यवहार के कारण है, लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि जब भी टीम खराब खेलती है तो सबसे पहले गाज कोच पर ही गिरती है। अब जबकि बोर्ड ने दशकों बाद एक देसी कोच चुना है, यह भी देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में भारतीय टीम की नाकामी की स्थिति में बोर्ड कुम्बले के साथ कैसा बर्ताव करता है।