टिहरी झील को पर्यटन की दृष्टि से विश्व मानचित्र पर एक अलग पहचान दिलाना स्थानीय विधायक और उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री दिनेश धनै का सपना है। इसके लिए खासे प्रयास भी किए जा रहे हैं, लेकिन झील में पर्यटन गतिविधियों के संचालन की जिम्मेदारी के लिए गठित टिहरी विशेष क्षेत्र पर्यटन विकास प्राधिकरण (टाडा) के अधिकारी और कर्मचारी मंत्रीजी के इस सपने को झील के ही पानी में डुबोने पर तुले हुए हैं।

हरीश रावत सरकार में पर्यटन मंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से ही क्षेत्रीय विधायक दिनेश धनै ने टिहरी झील को पर्यटन के क्षेत्र में विकसित करने के लिए कवायद शुरू कर दी थी। इसके लिए साल 2013 में टिहरी विशेष क्षेत्र पर्यटन विकास प्राधिकरण (टाडा) का गठन हुआ, जिसने 2014 से काम करना शुरू कर दिया।

टाडा को झील में होने वाली पर्यटन संबधी सभी गतिविधियों का जिम्मा दिया गया, लेकिन टाडा ने औपचारिकता निभाते हुए बोट लाइसेंस जारी किए और जेटी डाली गई।

बोट संचालकों का कहना है कि टाडा की ओर से अभी तक झील तक जाने के लिए पाथ-वे भी नहीं बनाया गया, अधिकारियों की गंभीरता अब पर्यटन सीजन में नजर आ रही है। जहां बोट तक जाने के लिए जेटी टूट गई है और झील के आसपास कबाड़ जमा होने लगा है। इससे पर्यटक ही नहीं स्थानीय बोट संचालक भी परेशान हैं और 27 जून से बोट संचालन बंद करने की चेतावनी दे रहे हैं।

पर्यटन व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय लोगों की ओर से 7 से 15 लाख की बोट झील में उतारी गई, लेकिन जेटी नहीं होने के चलते बोट्स को नुकसान पहुंच रहा है। झील के आसपास आए दिन टनों के हिसाब से कबाड़ जमा हो रहा है, लेकिन टाडा द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

झील में बोट संचालन के लिए बोट मालिकों की ओर से टाडा को 5 हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाता है। जिसके बदले टाडा की ओर से सुविधाएं देने की बात की जाती है, लेकिन न तो अभी तक कोटी से झील तक जाने वाली सड़क बन पाई है और न ही बोट संचालकों के लिए प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं। वहीं, टाडा के एसीओ सोहन सिंह राणा का कहना है कि टाडा अभी नई संस्था है और धीरे-धीरे टाडा की ओर से पर्यटन के क्षेत्र में कार्य किए जा रहे हैं।

टिहरी झील में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। मास्टर प्लान बनाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यहां पहुंचकर ही पता लगती है। ऐसे में जरूरत है तो पर्यटन मंत्री को भी इस ओर ध्यान देने की, जिससे टाडा के अधिकारी कर्मचारी कम से कम अपनी वो जिम्मेदारी तो निभाएं, जिसके लिए उन्हें मोटी तनख्वाह दी जाती है।