नैनीताल पर कम पड़ा ग्लोबल वॉर्मिंग का असर, टिहरी-चंपावत की हालत खराब

ग्लोबल वॉर्मिंग से हो रहे जलवायु परिवर्तन की सर्वाधिक मार उत्तराखंड में टिहरी व चंपावत जिलों पर पड़ी हैं। बड़ी बात ये है कि इसके विपरीत सबसे कम बुरा असर देहरादून और नैनीताल पर पड़ा है। उत्तराखंड वन विभाग और क्लाइमेट डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (सीडीकैन) के एक ताजा एवं विस्तृत सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है।

दरअसल, जलवायु परिवर्तन से तापमान में फर्क आया है, जिसका असर मानव स्वास्थ्य के अलावा वनस्पतियों और जलस्रोतों पर पड़ रहा है। हरिद्वार और अल्मोड़ा जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक नुकसान उठाने वाले जिलों में दूसरे पायदान पर हैं।

सर्वेक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक तीन साल पहले शुरू किए गए इस सर्वे में राज्य के विभिन्न जिलों की जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के प्रति संवेदनशीलता देखी गई। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए किए गए सर्वे में उत्तरकाशी, बागेश्वर, पौड़ी गढ़वाल, ऊधमसिंह नगर और रुद्रप्रयाग को मध्यम श्रेणी में रखा गया है। इन जिलों में जलवायु परिवर्तन का बुरा असर पड़ तो रहा है, लेकिन इन दुष्प्रभावों को संयत माना गया है।

इसके बाद हर जिले की रैंकिंग की गई। रैंक-13 वाले जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील और रैंक-1 को सबसे कम संवेदनशील जिले में रखा गया। सर्वे में सामाजिक, आर्थिक, जल, वन, कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि स्थिति के संकेतकों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों की स्थिति का आकलन किया गया।

सरकार को सर्वे रिपोर्ट मिलने के बाद अतिसंवेदनशील जिलों के लिए माइक्रो एक्शन प्लान तैयार किया गया है। अब तहसील और ब्लॉक स्तर पर सर्वे करके जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए योजनाएं तैयार की जाएंगी।

अत्याधिक संवेदनशीलता (रैंक-13, 12) – चंपावत, टिहरी गढ़वाल
अधिक संवेदनशीलता (रैंक-11,10) – हरिद्वार, अल्मोड़ा
संयत संवेदनशीलता (रैंक-9,8,7,6,5) – उत्तरकाशी, बागेश्वर, पौड़ी गढ़वाल, ऊधमसिंह नगर, रुद्रप्रयाग
कम संवेदनशीलता (रैंक-4,3) – चमोली, पिथौरागढ़
बहुत कम संवेदनशीलता (रैंक-2,1) – देहरादून, नैनीताल

संकेतक
सामाजिक – जनसंख्या, इंफ्रास्ट्रकचर
आर्थिक – प्रति व्यक्ति आय, जीडीपी
जलवायु – बारिश, तापमान
वन – वनस्पतियों का प्रकार, घनत्व, विविधता आदि
कृषि – फसलों का घनत्व, पैदावार, सिंचाई, फर्टिलाइजर का प्रयोग
स्वास्थ्य – हीट स्ट्रेस, मलेरिया का फैलाव
जल – जल की उपलब्धता, बाढ़ और सूखा

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव
तापमान
– तापमान में बढ़ोत्तरी से बारिश अनियमित हुई
– जलस्रोत सूख गए, झरनों में पानी कम हो गया
– बहुत सी वनस्पतियां सूख रही हैं, कई ने वास स्थल बदले
– मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, मलेरिया और दूसरी बीमारियां बढ़ीं
– तापमान में बदलाव से मानव प्रतिरोधक क्षमता कम हुई
– फसलों का घनत्व कम हो गया, पैदावार घट गई
– मौसम बदलने से वन्य जीवों के वास स्थल प्रभावित हुए