अस्थायी राजधानी देहरादून से पहाड़ों की रानी मसूरी जाने के लिए सैलानियों को परिवहन निगम की बसों में टिकट के लिए लगभग एक युद्ध की स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। ऐसे में अतिथि देवो भव: की नीति पर तो पलीता लग ही रहा है, साथ ही राज्य में पर्यटन के क्षेत्र की छवि भी खराब हो रही है।

परिवहन निगम की बसों की कमी सैलानियों पर भारी पड़ रही है। मसूरी घूमने के लिए देश-विदेश से भारी संख्या में सैलानी यहां आते हैं। मगर कई घंटे उन्हें बसों के टिकट को खरीदने में ही लग जाते हैं। परिवहन निगम न तो यात्रा सीजन में कोई अतिरिक्त टिकट काउंटर खोल रहा है और न बसों की संख्या बढ़ा रहा है। आखिर सैलानियों को जब कोई सुविधा नहीं मिलेगा, तो वे यहां क्यों आएंगे?

सैलानियों का कहना है कि सरकार को यहां की सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। बसों की कमी और टिकट न मिलने से सैलानी काफी परेशान हैं। राज्य गठन के बाद सैलानियों की सुविधाएं बढ़ाने के लिए परिवहन निगम ने अपनी बसों को मसूरी के लिए घटा दिया है। परिवहन निगम के कर्मियों का कहना है कि पहले 120 बार मसूरी तक बसें यात्रियों को लेकर आती जाती थी, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर महज 60 बार हो गई है।

इस तरह से यात्रियों को अब निजी टैक्सी का ही सहारा लेना पड़ रहा है, जिसकी वजह से यात्रियों की जेबों पर जहां टैक्सी ड्राइवर डाका डाल रहे हैं, वही परिवहन निगम के साथ शासन प्रशासन के अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे हैं। यह हाल तब है जब यात्रा सीजन अपनी पीक पर है, यानी देश के कोने-कोने से यात्री मसूरी घूमने आ रहे हैं। लेकिन अधिकारी अपनी गहरी नींद से जगने का नाम नहीं ले रहे।

बसों में टिकट के लिए यात्री पसीना बहा रहे हैं, एक तरफ परिवहन निगम के अधिकारी राजस्व की कमी का रोना रोते रहते हैं और जब उन्हें आय कमाने का मौका आते हैं तो वे ऐसे मौकों को नजरअंदाज कर देते हैं। फिलहाल जब अस्थायी राजधानी में यह हाल है तो राज्य के दूसरे जिलों की स्थिति कितनी मजबूत होगी इसका अंदाजा कोई भी लगा सकता है।