कांग्रेस के बागी विधायकों को नैनीताल हाईकोर्ट ने जोरदार झटका दिया है। हाईकोर्ट ने बागी विधायकों की याचिका को आधारहीन करार देते हुए खारिज कर दिया है। कोर्ट ने बागियों से कहा कि वे अपना पक्ष विधानसभा में ही रखें। इस फैसले को राज्य की हरीश रावत सरकार के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। अब ये भी माना जा रहा है कि हाईकोर्ट से झटका मिलने के बाद बागी विधायक सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा सकते हैं।

इससे पहले उत्तराखंड का सियासी बवाल शुक्रवार को अचानक हाईकोर्ट तक पहुंच गया। बागी विधायकों ने दो अलग-अलग याचिकाएं दायर कर विधानसभा स्पीकर के नोटिस को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट में सरकार की ओर से मशहूर वकील और वरिष्ट काग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने पैरवी की।

बागी विधायकों की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्पीकर गोविंद कुंजवाल की तरफ से दिए गए एंटी डिफेक्शन नोटिस को चुनौती दी गई थी। इस मामले पर जस्टिस सुधांशु धूलिया की कोर्ट में शुक्रवार दोपहर 3 बजे कार्रवाई शुरू हुई और शाम करीब पौने पांच बजे कोर्ट ने बागियों की याचिका खारिज करने का फैसला सुनाया।

बागी विधायकों ने दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थी। विधायक अमृता रावत, हरक सिंह रावत, कुंवर प्रणव चैम्पियन और प्रदीप बत्रा ने एक याचिका दाखिल की, जबकि दूसरी याचिका बागी विधायक शैलेंद्र मोहन सिंघल, शैलारानी, सुबोध उनियाल और उमेश शर्मा काऊ ने दाखिल की।

दूसरी याचिका में स्पीकर के नोटिस का जवाब देने के लिए दिए गए सात दिन के समय को कम बताते हुए चुनौती दी गई।

बागियों में से एक और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत का कहना है कि सभी को अलग-अलग ‘कारण बताओ नोटिस’ दिया गया था, इसलिए अलग-अलग याचिका लगाई है। उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष उन्हें सदन के आचरण के लिए नोटिस दे सकते हैं, लेकिन जब अध्यक्ष यह कह रहे हैं कि वित्त विधेयक पास हो गया तो हमने, पार्टी या सरकार के खिलाफ जाकर तो कुछ भी नहीं किया, जिसके लिए हमें नोटिस भेजा गया है।

हरक ने कहा कि हमने अभी कांग्रेस नहीं छोड़ी है। हम सरकार से असंतुष्ट हैं, लेकिन अब भी कांग्रेस के सदस्य हैं। हम पर दलबदल कानून लागू नहीं होता। इस मामले में शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई तय है। इस बीच बीजेपी के सभी 27 विधायक राजस्थान में पुष्कर पहुंचे हुए हैं।